सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला‘ के उपन्यासों में नारी शिक्षा एवं सामाजिक सशक्तिकरण
| Vol-4 | Issue-6 | June 2019 | Published Online: 12 June 2019 PDF ( 210 KB ) | ||
| Author(s) | ||
डॉ ऋृचा शर्मा
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1सह - प्राध्यापक, देव समाज काॅलेज आॅफ ऐजुकेशन सेक्टर 36 बी चंडीगढ़ |
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| Abstract | ||
प्रस्तुत शोधकार्य सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला‘ की रचनाओं में नारी शिक्षा एवं सामाजिक सशक्तिकरण विषय पर आलोचनात्मक मूल्यांकन करने के उद्देश्य से किया गया है। हिन्दी साहित्य विश्व का महान तथा पवित्र साहित्य है। सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला‘ की रचनाऐं भी इसी साहित्य की अमूल्य निधि है। महाप्राण निराला एक महान् कवि के लिये सर्वथा उपयुक्त, असाधारण व्यक्तिव लेकर अवतरित हुए और उनका सम्पूर्ण जीवन ही वीर रस का एक धार्मिक महाकाव्य है, जिसमें वीरता के सभी पक्ष . दानवीरता, दयावीरता और धर्मवीरता अनुस्यूत है। ‘निराला‘ हिन्दी साहित्य के उन रचनाकारों में से है जिनके पास सशक्त भाव और मन को बांधने वाली भाषा है, जो आम व्यक्ति को अपने साथ लेकर चलती है। उनकी रचनाएं सामाजिक दशा व उसमें नारी शिक्षा और सशक्तिकरण के अभाव को प्रस्तुत करती है। इन्होंने अपनी रचनाओं और कृतियों के माध्यम से समाज में प्रचलित कुप्रवृतियों, कुरीतियों एवं जड़ मान्यताओं, परम्पराओं व तत्कालीन सामाजिक समस्याओं को दर्शाया गया है। स्त्री जाति की मनोदशा, समस्याओं, संघर्षपूर्ण जीवन और उनका चुनौती पूर्वक समाधान निराला के उपन्यासों में विद्यमान है। उनके अनसाुर शिक्षा और ज्ञान का प्रसार ही नारी के संघर्ष, अज्ञान और अंधविश्वास से ग्रसित जीवन में रौशनी लाने का आधारभूत साधन है। |
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| Keywords | ||
| नारी, शिक्षा, समाज, सशक्तिकरण, निराला | ||
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