समकालीन हिन्दी उपन्यासों एवं कहानियों में स्त्री जीवन
| Vol-4 | Issue-02 | February 2019 | Published Online: 20 February 2019 PDF ( 693 KB ) | ||
| Author(s) | ||
| Mukesh Dahiya 1; Dr. Anupam Kumar 2 | ||
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1Research Scholar, Mewar University, Chittorgarh, (RAJASTHAN) (India) 2Assistant Professor, Hindu College, University of Delhi (India) |
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| Abstract | ||
आज नारी विमर्श के स्तर पर नारी चेतना से संपन्न हिंदी उपन्यास लिखे जा रहे हैं, जिसमें नारी की आत्मा, स्व और अहं ध्वनित है। वास्तव में चेतना का अर्थ विचारों, अनुभूतियों, संकल्पों की आनुषांगिक दशा, स्थिति अथवा क्षमता से है। उसका संबंध नारी की स्वयं की पहचान या किसी भी स्तर पर विषयगत अनुभवों के संगठित स्वरूप से होता है। नारी विमर्श और चेतना के विकास का ही परिणाम है कि नारी आज सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, व्यावसायिक और वैज्ञानिक क्षेत्र में पुरुष के समान ही नहीं बल्कि पुरुष से आगे बढकर अपनी निःशंक सेवाएं दे रही हैं। नारी चेतना का ही चरम है, जहाँ वह यह कहती है- ??मैं उन औरतों में नहीं हूँ, जो अपने व्यक्तित्व का बलिदान करती है, जिनकी कोई मर्यादा और शील नहीं होता है। मैं न उनमें हूँ, जिनके चरित्र पर पुरुष की हवा लगते ही खराब हो जाते हैं और न पति की गुलामी को सच्चरित्रा का प्रमाण मानती हैं। मुझमें आत्मनिर्भरता भी है और आत्मविश्वास भी। मुझे स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता है तो पति और परिवार के साथ सामंजस्य बनाने की शक्ति भी। अतः जीवन के यथार्थ को स्वीकार करने में कोई झिझक भी नहीं है। |
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| Keywords | ||
| नारी विमर्श, नारी चेतना, आत्मविश्वास, स्त्री जीवन, हिन्दी उपन्यास एवं कहानियां | ||
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