रहस्यवादी कवियों की सौंदर्य भावना
| Vol-5 | Issue-01 | January 2020 | Published Online: 20 January 2020 PDF ( 543 KB ) | ||
| Author(s) | ||
| डॉ. प्रमिला महानन्दे 1 | ||
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1जनता महाविद्यालय, चंद्रपुर |
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| Abstract | ||
जीवन और प्रकृति के क्षेत्र से चयनित अनुभवों से ही कवि बिम्ब निर्माण करता हैं , जिस की दृष्टी जितनी ही सूक्ष्मदर्शी होती है। उतना ही उसका अनुभव क्षेत्र विस्तृत होता है और उसके बिंब में विधान उतने ही उर्वरक, नविन एंव स्टष्ट होते हैं तथा उनके निर्माणार्थ साहित्यकार के लिए वैसी ही चित्रभाषा की आवश्यकता हो जाती है उसी प्रकार के सांकेतिक प्रतीकों की भी। प्रत्येक साहित्यकार के अंतकरण में भवावास अथवा विचराभास कुछ, धुंधला, अस्पष्ट एंव रूपहीन कवि ह्रृदय को आंदोलित कर देने वाला स्फुरण मात्र होता है। जो संवेदना के रूप में साहित्य - सर्जन का प्रेरक होता है। मानव एक विचारशील प्राणी है और वह जीवन के प्रति नयी - नयी जिज्ञासाओं से घिरा रहा है। कभी उसे ब्रम्ह के प्रति जिज्ञासा जगती है तो कभी ब्रम्हा की सृष्टि के प्रति, कहने का मतलब यह है की मानव बुद्धि आरंभिक कल से लेकर अब तक जिज्ञासा से ग्रस्त रही है, और संभव है जब तक उसका अस्तित्व है, उसका मन अशांत ही रहेंगा। यथार्थ मानव जीवन की भावनात्मक जटिलताओं की वृद्धि के साथ ही प्रतिकों का अर्थ भावनाएं भी बढ़ती, एंवम जटिल होती आई है। अतएवं हम कह सकते हैं की साहित्यिक प्रतीकों का ऐतिहासिक विकास जातीय जीवन के अनेक सूक्ष्म रहस्यात्मक अनुभवों की शक्ति समेटे हुए है। |
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| Keywords | ||
| जिज्ञासा - ज्ञान की प्राप्ति की खोज / जानने की इच्छा अद्वैतवाद - जड़चेतना या आत्मा परमात्मा की एकता वाग्विलास - आनंदपूर्वक बातचित करना / मौज, तत्वदृष्टा - सृष्टि की उत्पति से संबंधित विद्या निर्विकार - विकरहित / उदासी | ||
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