भारतीय समाज में दलित बचपन

Vol-4 | Issue-03 | March 2019 | Published Online: 13 March 2019    PDF ( 123 KB )
Author(s)
सीमा 1

1शोधार्थी, हिन्दी विभाग, महर्षि दयानन्द विश्वविद्यालय, रोहतक

Abstract

दलित आत्मकथाएँ भारतीय समाज में वर्ण और जाति की विभीषिकाओं का आईना है। हिन्दी में जितनी भी आत्मकथाएँ प्रकाशित हुई हैं, उन्हें पढ़कर एक बात तो साफ तौर पर कही जा सकती है कि भारतीय समाज में सवर्णों ने दलितों को पूर्ण रूप से अपंग बनाने के तमाम उपाय किए हुए हैं, परन्तु संघर्ष की लम्बी परम्परा का सहारा पाकर दलितों ने अपने आदमी होने को सिद्ध किया है। संत रैदास, कबीर, ज्योतिबा फुले, सावित्री बाई फुले, डाॅ. बी. आर. अम्बेडकर की चेतना का धीरे-धीरे दलितों में प्रवाह हो रहा है। डाॅ. अम्बेडकर के सामाजिक आन्दोलन में अवतरण और आजादी के बाद यह प्रवाह तीव्र गति से प्रसार पा रहा है। दलित साहित्यकारों ने अपने बचपन में हुए अनुभवों को उकेरा है। साहित्य के माध्यम से आज वो सब पढ़ लिखकर अपने आने वाली पीढ़ियों को शिक्षा के प्रति जागरूक कर रहे हैं।

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