वर्तमान परिप्रेक्ष्य मे माध्यमिक स्तर के विधार्थियों की पर्यावरण जागरूकता का विश्लेषणात्मक अध्ययन

Vol-4 | Issue-5 | May 2019 | Published Online: 15 May 2019    PDF ( 401 KB )
Author(s)
हृदेश कुमार शर्मा डा0 आर0 आर0 सिंह 1; डा0 आर0 आर0 सिंह 2

1शोध छात्र

2निर्देशक

Abstract

सृष्टि के आरम्भ से लेकर आज तक मनुष्य का अपने पर्यावरण से अति घनिष्ठ सम्बन्ध रहा है। प्रकृति प्रदŸा उपहारों से मनुष्य ने सदा ही अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति की है। प्रकृति पर निर्भर मनुष्य ने अपनी स्वाभाविक जिज्ञासाओं के समाधान और अधिकाधिक सुविधापूर्ण जीवन-प्राप्ति की लालसा के वीभूत अनेकानेक वैज्ञानिक अविष्कार किये।आज विश्व के कोने-कोने से पर्यावरण के प्रति चिन्ता की जो आवाज उठ रही है। वह हमारे ऋषि मुनियों ने वैदिक काल में ही दे दी थी, क्योंकि वे पृथ्वी की धरती माँ मानते हुए उसकी सुरक्षा करने, उसको संवारने, वन्य जीव जन्तुओं आदि की रक्षा करने के प्रति सदैव सजग थे। हमारे ऋषि मुनियों ने वेदों की ऋचाओं का सृजन प्रकृति की गोद में ही किया था। महर्षि कपिल, कश्यप और पाराशर जैसे मुनिगण ने पर्यावरण को जन आन्दोलन के रूप में लिया था अर्थात् वनों को पुत्रवत् मानकर उनकी रक्षा के लिए सदैव तत्पर बाल्मीकि चेतावनी देते हैं कि जो भी मेरे वन के पत्र एवं अंकुर का विनाश और फल फूल का अभाव करेंगें, वे निश्चित रूप से शाप के भागी होंगें। पर्यावरण को संरक्षित रखने के लिए प्रकृति तथा मानव का उचित समीकरण बहुत आवश्यक है। अर्थात् मानव अपनी इच्छाओं को वश में रखकर प्रकृति से इतना ही ग्रहण करे कि उसकी पूर्णता को क्षति न पहुँचे। डाॅ0 बी0 डूस ने भी चेतावनी देते हुए कहा है कि ‘1990-2020’ के बीच हर रोज 50 जीव और पादप प्रजातियाँ समाप्त होती जायेंगी। अगर वनों के कटाव और औद्योगिक गैसों से उत्पन्न तापक्रम वृद्धि पर नियन्त्रण न हो पाया तो भयंकर परिणाम होंगें।

 

Keywords
शहरी ग्रामीण पर्यावरण जागरूकता
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