भारतीय समाज एवं घरेलू हिंसा: सामान्य विवेचन

Vol-4 | Issue-01 | January 2019 | Published Online: 20 January 2019    PDF ( 98 KB )
Author(s)
डाँ बलवीर सेन 1

1सह-आचार्य (समाजशास्त्र) राजकीय महाविद्यालय, मेड़ता सिटी, नागौर (राज0)

Abstract

आज नारी के प्रति आपराधिक हिंसा ही नहीं बढ़ रही है, अपितु घेरलू हिंसा में भी अत्यधिक वृद्धि हो रही है। घरेलू हिंसा का सम्बन्ध घर-गृहस्थी में नारी का किया जाने वाला शारीरिक और मानसिक उत्पीड़न है। विवाह के समय नारी सुनहरे स्वप्न देखती है कि अब प्रेम, शान्ति आत्म-उपलब्धि का जीवन प्रारम्भ होगा। परन्तु इसके विपरीत सैकड़ों विवाहित नारियों के यह सपने क्रूरता से टूट जाते हैं। वे पति द्वारा मार-पीट और यातना की अन्तहीन लम्बी अन्धेरी गुफाओं में अपने आपको पाती हैं, जहां उनकी चीख-पुकार सुनने वाला कोई नहीं होता। दुख तो यह है कि ऐसी मार-पीट का जिक्र करने में भी उन्हें लज्जा अनुभव होती है और यदि वे शिकायत भी करें तो खुद उन्हें ही दोषी माना जाता है या उन्हें भाग्य के सहारे चुपचाप सहने की सलाह दी जाती है। पड़ौसी ऐसे मामलों में प्रायः हस्तक्षेप नहीं करते क्योंकि यह पति-पत्नी के बीच एक निजी मामला समझा जाता है। यदि पुलिस में रिपोर्ट करने जाएं तो वहां भी पुरूष प्रधान संस्कृति में पले पुलिस अधिकारी पहले नारी का ही मजाक उड़ाते हैं और रिर्पाेट लिखने में आनाकानी करते हैं। पुरूष को पत्नी की पिटाई का निरपेक्ष अधिकार है और आम आदमी यह मानकर चलता है कि नारी पिटने लायक ही होगी। अतः पिटेगी ही। दुर्भाग्य की बात है कि ऊपर से शान्त और सम्मानित प्रस्थिति वाले अनेक परिवारों में, जहां पति-पत्नी दोनों शिक्षित और आत्म-निर्भर है, फिर भी मार-पीट की घटनाएं हो जाती हैं और यह नियमितता का रूप लेने लगती हैं। कहीं-कहीं पिता भी अपनी अविवाहित बेटियों के साथ बहुत मार-पीट करते हैं। ऐसी स्थिति में सामाजिक दृष्टि से नारी बड़ा असहाय महसूस करती है क्योंकि वह जहां-कहां शिकायत करें, चाहे पड़ौसी हो, चाहे उसके सगे-सम्बन्धी, चाहे पुलिस, वकील या जज़, सभी उसे समझौता करने की सलाह देते है।

Keywords
भारत, हिंसा, घरेलू, नारी।
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