कौटिल्यकालीन राजतंत्रा

Vol-4 | Issue-5 | May 2019 | Published Online: 25 May 2019    PDF ( 117 KB )
Author(s)
डा. रेणु सिंह 1

1शिक्षिका, (राजनीति विज्ञान) श्री राम लखन सिंह यादव सर्वोदय उच्चत्तर माध्यमिक विद्यालय, बिहार सरकार, पुनाईचक, पटना-23

Abstract

कौटिल्य का राज-व्यवस्था संबंध्ी महत्त्वपूर्ण ग्रंथ अर्थशास्त्रा का विशद् विश्लेषण है। इस ग्रंथ में अनेक विचारों को समाहित किया गया है । इसमें कौटिल्यकालीन राजतंत्रा का उल्लेख है। तत्कालीन समय में राजपद वंशानुगत हो गया था, एवं उत्तराध्किार के नियम कठोर थे। राज्याभिषेक संस्कार पर कौटिल्य का विशेष बल नहीं देना, परन्तु उसकी अनिवार्यता की चर्चा परम्परा से जुड़ा माना जा सकता है। राजा के गुणों एवं योग्यताओं पर आधरित राजपद की चर्चा है। वस्तुतः कौटिल्य ने राजतंत्रा को ही सबसे उपयुक्त संविधन माना है। भले ही वह प्रजातांत्रिक संविधनों से भी अवगत था। वह राजा से आदर्श चरित्रा की अपेक्षा रख संवैधनिक प्रजातंत्रा का पुट राजतंत्रा में डालना चाहता था।

Keywords
राजतंत्रा, प्रजा, मत्स्यन्याय, कत्र्तव्य
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