स्त्री चिंता एवं सरोकार के बहस-मुबाहसे: ‘स्त्री दर्पण’ पत्रिका के बहाने

Vol-4 | Issue-5 | May 2019 | Published Online: 25 May 2019    PDF ( 532 KB )
Author(s)
मनीष कुमार सिंह 1

1शोध छात्र, म. गां. अं. हिं. वि. वि. वर्धा

Abstract

दुर्भाग्य से भारतीय प्रेस व प्रकाशन में महिलाओं की सक्रियता के इतिहास का दस्तावेजीकरण लगभग न के बराबर हुआ है। ब्रिटिश काल के दौरान भारतीय उपमहाद्वीप में सामाजिक परिवर्तन बहुत तेजी से हुये। उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में महिलाओं की शिक्षा को पुरुषों की शिक्षा के समान महत्व दिया जाने लगा। शिक्षित होने के पश्चात महिलाएं कई क्षेत्रों में सक्रिय भूमिका निभाने लगीं जिसमें से एक प्रेस था। ज्ञातव्य है कि शुरुआत में शिक्षित महिलाए ‘अभिजात्य वर्ग या उच्च जातीय महिलाएं थीं। बीसवीं शताब्दी के प्रथम दशक के अंत से व दूसरे दशक प्रारम्भ से महिलाओं की आवाज हिंदी पत्रकारिता में मुख्य रूप से सामने आना शुरू होती है। यही वह दौर था जब हिंदी पत्रकारिता महिलाओं के मानसिक विकास करने के साथ-साथ उन्हें उन प्रश्नों से मुक्ति दिलाने की कोशिश कर रही थी जो जिसने उनके शरीर और दिमाग को जकड़ रखा था। इसी क्रम में हम स्त्री दर्पण पत्रिका का प्रकाशन प्रारम्भ होता है जो कि जो महिलाओं में जागरूकता प्रसार कर रही थी। प्रस्तुत लेख में स्त्री दर्पण के विषय वस्तु विश्लेषण के जरिये तत्कालीन संदर्भ में स्त्री मुद्दो पर बात की गयी है।

Keywords
स्त्री दर्पण, जागरूकता, स्त्री शिक्षा, सामाजिक कुरीतियाँ
Statistics
Article View: 1606