समाजशास्त्रीय द्रष्टि से जन-जीवन का स्वरुपरू शैलेश मटियानी जी के साहित्य में
| Vol-3 | Issue-01 | January 2018 | Published Online: 28 January 2018 PDF ( 120 KB ) | ||
| Author(s) | ||
| Saroj Rani 1; Dr. Navneeta Bhatia 2 | ||
|
1Research scholar OPJS University, Churu (Rajasthan) 2Assistant Professor ,Hindi department,OPJS University Churu (Rajasthan) |
||
| Abstract | ||
जन का मतलब ‘‘लोक, लोग प्रजा, सर्वसाधारण, जनता, अनुयायी, अनुचर’’ अनुयायी, अनुचर’’ होता है तथा जीवन का अर्थ ‘‘जीता रहना, ‘‘जीता रहना, जीता रहना, प्राण धारण, जीवित दशा, धारण, जीवित दशा, जिंदगी, पा्रणी, जीविका, अत्यधिक प्यार, परमणी, जीविका, अत्यधिक प्यार, परम प्रिय’’ आदि अर्थों को समेटा है लेकिन जन-जीवन का मूल अर्थ ‘सामान्य जीवन’ से है जो समय तथा परिवेश के प्रति एक विशिष्ट दृष्टिकोण है।ला ेक शब्द की व्य ुत्पत्ति, संस्कृत के लोकदर्शने धातु से हुई हंै।जिसका अर्थ ‘देखने वाला‘ तथा रूढ़िगत अर्थ ’सामान्य लोग’ है।‘लोक‘ शब्द अत्यन्त पुराना है जिसका प्रयोग अथर्ववेद में हुआ है। प श्रीपद् दोमोदर सातवलेकर के अनुसार जन का अर्थ- ‘प्रजनन करनेवाला‘ जन मे ं इसके अतिरिक्त कोई गुण नहीं होता। ‘जन’ के लिए‘आत्महनो जनाः‘ भी कहा गया है ‘लोक‘ केवल देखता है आत्मोद्धार केमार्ग पर उन्नति नहीं करता। मनन करने वाला ‘मनुष्य‘ है ,तो भोगों मंेरमण करने वाला ‘नर’ कहलाता है। कहा जाता है कि ‘न रमते नरतिइति नरः’। नर श्रेणी में। जन्म लेना और मर जाना तथा अपने जैसेऔर पैदा कर जाना ‘जन’ है लेकिन लोक संज्ञा का अधिकारी बनने केलिए उसमे ं दर्शन क्षमता होना चाहिए। |
||
| Keywords | ||
| जन-जीवन, शैलेश मटियानी, समाजशास्त्रीय द्रष्टि | ||
|
Statistics
Article View: 454
|
||

