महाभारत काल में प्रतिपादित राजनीतिक व्यवस्था का सामान्य विश्लेषण
| Vol-4 | Issue-8 | August 2019 | Published Online: 16 August 2019 PDF ( 193 KB ) | ||
| Author(s) | ||
Dr. Vishal Singh
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1Assistant Professor, S.R.S.P.G. College, Kumher, Bharatpur, Rajasthan (India) |
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महाभारत में राजव्यवस्था का विकसित रूप पाया जाता है। राजनीतिक व्यवस्था के विकसित रूप में राजा को व्यापक अधिकार एवं कत्र्तव्य प्राप्त होते हैं। महाभारत युग में राजनीतिक व्यवस्था का राजा अन्तिम आस्पद तक बन जाता है। ऐसा माना जाने लगा है कि राजा के बिना समाज एवं राज व्यवस्था में अराजकता के अलावा कोई विकल्प नहीं है। इस सन्दर्भ में उसके निरंकुश होने का भी प्रश्न उठता है। राजा के केन्द्रीय शक्ति के विकास में पश्चिमी विद्वानों की यह आम धारणा रही है कि भारतीय राजनीतिक व्यवस्था का स्वरूप अनियन्त्रित तथा स्वेच्छाचारी है। नारद स्मृति के एक श्लोक के आधार पर यह माना गया कि धर्मशास्त्र एवं अर्थशास्त्र परम्परा में राजा की आज्ञा को चुनौती देने वाली कोई शक्ति नहींे है चाहे उसकी आज्ञा व्यक्ति एवं समाज के विपरीत ही क्यों न हो। परन्तु महाभारत में राजा को नियन्त्रित करने के उचित साधन मौजूद है। जिससे इस तरह के भ्रम का खण्डन होता है। महाभारत में राजनीतिक व्यवस्था पर नियन्त्रण की बिखरी सामग्री को एकत्रित करने पर नियन्त्रित राजनीतिक व्यवस्था का रूप सामने आता है। नियन्त्रण के मुख्यतः दो साधन है-निरोधात्मक एवं प्रतिरोधात्मक। इसमें नियंत्रण के सैद्धान्तिक एवं व्यावहारिक दोनों तत्वों का समन्वय है। |
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| Keywords | ||
| निरोधात्मक, पारलौकिकता, वर्णों, श्लोक, निरंकुश, स्मृति | ||
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