ममता कालिया के उपन्यासों में नारी चेतना
| Vol-3 | Issue-07 | July 2018 | Published Online: 05 July 2018 PDF ( 107 KB ) | ||
| Author(s) | ||
| डाॅं. विद्या शशीशेखर शिंदे 1 | ||
|
1आय. सी. एस. काॅलेज, खेड, रत्नागिरी, महाराष्ट्र् |
||
| Abstract | ||
प्रेमचंदजी ने विकासात्मक स्तर पर नारी को ही श्रेष्ठता प्रदान करते हुए लिखा है- ‘‘मैं प्राणियों के विकास में स्त्री के पद को पुरुषों के पद से श्रेष्ठ समझता हूंॅ, उसी तरह जैसे प्रेम, त्याग और श्रद्धा को हिंसा और संग्राम और कलह से श्रेष्ठ समझता हूॅं। स्त्री पुरुष से उतनी ही श्रेष्ठ है, जितना प्रकाश अॅंधेरे से।‘‘1 साठोत्तरी महिला उपन्यासकारों में श्रीमती ममता कालिया का स्थान श्रेष्ठ रहा हैं. उनके उपन्यासों में परंपरा एवं रुढियों को तोडती, अपने स्वतंत्रता के लिए जूझती, कभी सफल तो कभी असफल होती, नवीन मूल्यों को ग्रहण करने में सशक्त नारी का जो रुप उभर आया हैं, वह वास्तव में अभिनव ही हैं. बीसवी शताब्दी के उत्तरार्ध में भारत में ही नहीं बल्कि विश्व के प्रायः प्रत्येक कोने में नारी के सामने अपनी हीन अवस्था से उभरने की समस्या सबसे प्रमुख थी. यद्यपि उस समस्या का समाधान अब भी नहीं हो पाया हैं., किंतु नारी उसके लिए पूर्ण तत्परता से सचेष्ट हैं. आर्थिक स्वतंत्रता, राजनीतिक तथा सामाजिक अधिकार, शिक्षा तथा प्रगति आदि कुछ समस्याएॅं जिनके लिए नारी ने संघर्ष आरंभ किया हैं. ममताजी ने इस कार्य में विशेष रुचि लेकर स्वयं नारी के साथ-साथ समाज के ठेकेदारों को उसकी दयनीय दशा के प्रति सजग करने की चेष्टा की. अस्तित्व प्राप्ति के लिए निरंतर क्रियाशील रहनेवाले उनके नारी पा़त्रों की विभिन्न चेतनाओं को प्रमाण के रुप में पाठकों के सामने रखना हैं. |
||
|
Statistics
Article View: 343
|
||

