दहेज उत्पीड़न के लिये उत्तरदायी परिस्थितियों एवं सिद्धान्तों का एक समाजशास्त्रीय अध्ययन

Vol-2 | Issue-9 | September 2017 | Published Online: 15 September 2017    PDF ( 119 KB )
Author(s)
Dr. Sudha Kumari 1

1Working Teacher Subject of( Home Science) +2 Govt Teacher in Higher Secondary School at Noora Jila Parishad, Patna

Abstract

1970 के पूर्व दहेज के लिए नारियों को जान से मारने एवं मरने के लिए विवश करने की घटनायें संचार के माध्यमों द्वारा यदा-कदा ही प्रकाश में आती थी। यदि किसी घटना का कहीं समाज में उल्लेख मिलता था तो इस बात को सुनने वाले यह संतोष कर लेते थे कि उस नारी में कोई मनोवैज्ञानिक असंतुलन रहा होगा, मानसिक रूप से विक्षिप्त रही होगी या किसी कारणवश उस महिला का टूटा हुआ व्यक्तित्व होगा। परन्तु अस्सी के दशक से संचार मीडिया ने आय दिन दहेज के लिए नववधू को मारने-पीटने, जलाने, गला दबाकर हत्या करने एवं आत्महत्या के लिए विवश करने की घटनाओं का जब निरन्तर उल्लेख करना प्रारम्भ किया तो भारत के समाजशास़्त्रीयों का ध्यान इधर विशेष रूप से आकृष्ट हुआ। भारतीय समाजशास्त्रियों ने 1970 तक ग्रामीण समाज के अध्ययन, जनजाति समाजों के अध्ययन, पारिवारिक स्वरूप, समाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया का अध्ययन आदि ऐसे विषयों पर अपना ध्यान शोध के लिए केन्द्रित रखा। तदोपरान्त पारिवारिक स्वरूप के अध्ययन के अन्तर्गत दहेज के कारण स्त्रियों के उत्पीड़न का अध्ययन करना उनके लिए अनिवार्य हो गया। उत्तरोत्तर इस प्रकार की बढ़ती घटनायें केवल परिवार को ही संकट में नहीं डाला है वरन् सम्पूर्ण समाज को झकझोर कर रख दिया है। प्रस्तुत अध्ययन में भारतीय समाज में नवविवाहिताओं के साथ हो रहे दहेज उत्पीड़न के लिये उत्तरदायी प्रमुख परिस्थितियों एवं सिद्धान्तों को समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से रेखांकित किया गया है।

Keywords
उत्पीड़न, विक्षिप्त, संचार, मनोवैज्ञानिक असंतुलन
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