दलित आत्मकथा-लेखन की प्रयोजनीयता
| Vol-4 | Issue-01 | January 2019 | Published Online: 20 January 2019 PDF ( 145 KB ) | ||
| Author(s) | ||
| ज्वाला चन्द्र चौधरी 1 | ||
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1शोधार्थी, विश्वविद्यालय हिन्दी-विभाग, ल॰ना॰ मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा |
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| Abstract | ||
दलित आत्मकथा लेखन की बहुत विशद् परंपरा रही है, जिसमें दलितों ने अपने भोगे तथा जिए हुए यथार्थ का उद्घाटन करता है। दलित-साहित्य का प्रयोजन परंपरित-साहित्य के प्रयोजन से पृथक् है। जहाँ परंपरित साहित्य का सृजन अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष तथा आत्मानंद के लिए किया जाता है, वहीं दलित-साहित्य सामाजिक-धार्मिक-सांस्कृतिक तथा आर्थिक व्यवस्था के प्रति बौद्धिक विद्रोह है। यह साहित्य अलग सौन्दर्यशास्त्र की माँग करता है। दलित-साहित्य की प्रयोजनीयता अलग और बहुआयामी हैं। इसमें दलित मूलतः अपनी अस्मिता की तलाश कर अपने लिए समतामूलक समाज-निर्माण की चेतना जगाता है। |
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