छायावादी काव्य का समीक्षात्मक मूल्यांकन
| Vol-3 | Issue-12 | December 2018 | Published Online: 10 December 2018 PDF ( 123 KB ) | ||
| Author(s) | ||
| डाॅ0 कंचनलता सिंह 1 | ||
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1वरिष्ठ प्रवक्ता (हिन्दी विभाग), स्वतंत्र गल्र्स डिग्री कालेज, स्नेह नगर, आलगबाग, लखनऊ |
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| Abstract | ||
अंग्रेजी में जिसे रोमाटिसिज्म कहते है हिन्दी में उसे छायावाद कहते है। यो तो हिन्दी कविता मंे छायावाद का युग द्विवेदी युग के बाद आया किन्तु उसका आरम्भ द्विवेदी युग में ही हो गया था। छायावाद ने भाषा और छन्द को नवीनता प्रदान की। छायावाद का सांस्कृतिक और भावानात्मक सम्बन्ध अतीत और अंग्रेजी की रोमांटिक कविता से स्थापित हो गया था। छायावादी युग के प्रतिनिधि कवि हंै - जयशंकर प्रसाद, सूर्यकान्त त्रिपाठी, निराला, सुमित्रानन्दन पंत और महादेवी वर्मा। छायावाद शब्द का प्रयोग दो अर्थाें में समझना चाहिए, एक तो रहस्यवाद के अर्थ में अर्थात् जहाँ कवि उस अनन्त और अज्ञात प्रियतम् को आलम्बन बनाकर अत्यंत चित्रमयी भाषा में प्रेम की अनेक प्रकार से व्यंजना करता है। इसका दूसरा अर्थ काव्य शैली या पद्धति विशेष के व्यापक अर्थ मंे होता है, छायावादी काव्य की प्रमुख विशेषता है - नारी सौन्दर्य और प्रेम चित्रण तथा प्रकृति सौन्दर्य और प्रेम की व्यंजना। |
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| Keywords | ||
| प्रगतिवाद बनाम, छायावाद, मानवीय मूल्यांे की प्रतिष्ठा, मानवतावादी विचारधारा, व्यक्तिनिष्ठ, कल्पनावादी। | ||
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