किन्नरों की मानसिक व सामाजिक पीड़ा व अस्तित्व का संघर्ष (पोस्ट बाॅक्स नं. 203 नाला सोपारा के संदर्भ में)
| Vol-4 | Issue-04 | April 2019 | Published Online: 15 April 2019 PDF ( 113 KB ) | ||
| Author(s) | ||
सविता रानी
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1प्रवक्ता हिन्दी विभाग माता हरकी देवी महिला महाविद्यालय, औढंा सिरसा (हरियाणा) |
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| Abstract | ||
विश्व के सभी समाजों में किन्नरों का भी एक वर्ग है जिसे थर्ड जेंडर, हिजड़ा, खुसरा, उभयलिंगी आदि नामों से संबोधित किया जाता है। आज हम 21वीं सदी में जी रहे हैं और अपने आप को बहुत आधुनिक मानते हैं लेकिन मन व मस्तिष्क आज भी दकियानूसी विचारों की संकीर्णता की बेड़ियों में जकड़ा हुआ है। सभ्य कहलाने वाला समाज आज भी इन लोगों के अधिकारों और अस्तित्व को अनदेखा कर रहा है। माँ-बाप के साथ ही साथ समाज भी उन्हें नकार रहा है। सामाजिक व्यवस्था के कारण वे अन्दर से टूट रहे हैं। चित्रा मुद्गल का सम्पूर्ण साहित्य मानवीय संवेदनाओं से ओत-प्रोत दिखाई देता है और पोस्ट बाॅक्स नं. 203 नाला सोपारा भी मानवीय और सामाजिक मूल्यों से अछूता नहीं है। याद रहे कि जब हम किसी से प्रकृति प्रदत्त लिंग के आधार पर भेदभाव करते हैं तो निश्चय ही हम उनके मानवाधिकारों का हनन कर रहे होते हैं। |
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| Keywords | ||
| अस्मिता, संस्कृति, पितृसत्तात्मक, किन्नर समाज, संवेदना | ||
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