सुमन राजे की दृष्टि में स्त्री-विमर्श

Vol-5 | Issue-10 | October-2020 | Published Online: 15 October 2020    PDF ( 267 KB )
DOI: https://doi.org/10.31305/rrijm.2020.v05.i10.027
Author(s)
कुमारी सीमा 1

1असिस्टेंट प्रोफेसर, एस.एन.एस.आर.के. कॉलेज, सहरसा

Abstract

सुमन राजे तार-सप्तक में शामिल कवयित्री हैं। किन्तु उनकी पहचान कवयित्री से अधिक साहित्येतिहासकार के रूप में अधिक है। उन्होंने पहली बार स्त्री-दृष्टि से इतिहास लेखन का प्रयास किया। स्त्री की जातीय अस्मिता की तलाश करते हुए उन्होंने ‘इतिहास में स्त्री’ की तलाश की और गौण कर दी गई अथवा विस्मृत कर दी गई स्त्रियों के योगदान को अपनी पुस्तक ‘हिंदी साहित्य का आधा इतिहास’ में जगह देकर सामने लाने का प्रयास किया। उन्होंने साहित्येतिहास इतिहास में स्त्रियों को स्थापित करने के क्रम में अपनी स्त्री चिंतन विषयक दृष्टि भी स्पष्ट की है। उन्होंने वैश्विक स्तर पर स्त्री-विमर्श की शुरूआत दिखाने के साथ भारतीय एवं पश्चिमी नारी चिंतन एवं नारी आंदोलन के स्वभावगत अंतर को स्पष्ट किया है। इसके साथ ही भारत में स्त्री-विमर्श के विभिन्न चरणों का तर्कपूर्ण विश्लेषण करते हुए स्त्री चिंतन के अपने सरोकारों को भी सामने रखा है। उनके स्त्री चिंतन से आधा इतिहास की इतिहास दृष्टि को समझने में मदद मिलती है।

Keywords
स्त्री-विमर्श, साहित्येतिहास, उत्तर-आधुनिकता
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