हिलसा का भौगोलिक एवं एैतिहासिक महत्व

Vol-5 | Issue-9 | September-2020 | Published Online: 15 September 2020    PDF ( 2 MB )
DOI: https://doi.org/10.31305/rrijm.2020.v05.i09.063
Author(s)
डाॅ0 अशोक कुमार 1

1सहायक प्राध्यापक, भूगोल विभाग, जामताड़ा महिला संध्या महाविधालय,जामताड़ा (झारखण्ड)

Abstract

हिलसा गंगा के मैदानी भाग में गंगा नदी के दक्षिण में स्थित नालान्दा जिला एक अनुमण्डल मुख्यालय है। यह पटना-फतुहा इसलामपुर रेलमार्ग का मुख्य स्टेषन है। मगध की भूमि पर स्थित हिलसा प्राचीन काल से ही महत्वपूर्ण गाँव के रूप में रहा है।
यह षहर 250 10’ 10’’ उत्तर से 250 12’ 14’ उत्तरी अक्षांष तथा 850 15’ 14’’ पूर्वी देषान्तर के बीच फैला है। इसका कुल क्षेत्रफल 209 वर्ग किलोमीटर है। यहाँ की कुल जनसंख्या 2011की जनगणना के अनुसार 51052 व्यक्ति है जिसमें 27055 पुरूश और 23997 महिलाएँ है। यह नालन्दा जिला मुख्यालय बिहार षरीफ के पष्चिम मंे स्थित हिलसा नालन्दा जनपद का एक प्रमुख भौगोलिक एवं सांस्कृतिक स्थल है। 9 नवम्बर 1971 ई0 को हिलसा चार प्रखण्डों को मिलाकर अनुमंडल मुख्यालय बनाया गया। हिलसा की अपनी ऐतिहासिक भूमिका है। हजारो वर्श पूर्व यह नगर हिन्दु और मुस्लिम संस्कृति से संबंधित रहा है जो साम्प्रदायिक सद्भावना की देन है।
इस षहर के नामाकरण के संबंध में अनेक आनन्दायक कथाएँ प्रचलित है। बेगलर तथा कनिधंम जैसे पुरातत्वविदों ने हिलसा देव तथा जुम्मन यति के संबंध में अनेक कथाओं का उल्लेख किया है। जुम्मन यति के संबंध में अनेक कथाओं की उल्लेख किया है। जुम्मन यति एवं हिलसा देव के बीच संघर्श के क्रम में हिलसा देव की हार हुई एवं जुम्मन यति की जीत हुई।
दुसरी कथा के अनुसार कहा जाता है कि राजगृह से चलते हुए श्री कृश्ण का बड़ा भाई बलराम जिसे हलधर के नाम से जाना जाता था। हिलसा के वर्तमान काली स्थान के निकट एक तालाब है जिसके किनारे अपना हलधरपुर था। जो बाद में चलकर हिलसा के नाम से जाना जाता है।
भौगोलिक संरचना की दृश्टि से हिलसा मध्य गंगा के समतल मैदानी भाग में स्थित एक उपजाऊ मैदानी भाग है। यह एक निक्षेपात्मक मैदान है। दक्षिण की ओर से बहने वाली नदियों से वर्शा काल में प्रायः बाढ़ आ जाया करती है। यह
पूरा का पूरा मैदानी भाग बाढ़ के मैदानी भाग में स्थित है। यहाँ की मुख्य नदी फल्गु है। जो अपनी सहायक नदियों के साथ मैदानी भाग में बाढ़ के लिए प्रसिद्ध है।
नालन्दा जिला का यह क्षेत्र मौनसूनी जलवायु के अन्तर्गत पड़ता है। यहाँ तीन ऋतुएँ पाई जाती है - जाड़ा, गर्मी एवं बरसात। गर्मी का औसत तापमान 230 सेन्टीग्रेड तथा जाड़े का औसत तापमान 150 सेन्टीग्रेड रहता है। यहाँ औसत वार्शिक वर्शा 150 सेन्टीमीटर से कुछ अधिक होती है। मिट्टी यहाँ की मूल चट्टानों से निर्मित है। यहाँ क्ले मिट्टी पाई जाती है जिसे केवाल के नाम से जाना जाता है। यह मिट्टी बरसात के दिनों में थोड़े ही पानी सोखने पर काफी कीचड़ युक्त हो जाती है। यह मिट्टी काफी उपजाऊ होती है, जिसमें विभिन्न प्रकार के फसल उपजाये जाते हैं। यहाँ मौनसुनी प्रकार की वनस्पति पाई जाती है, जो ग्रीश्म ऋतु के षुरूआत में अपने पत्ते झड़ा देती है। यहाँ की मुख्य सड़क के दोनों और वन के रूप में वृ़क्षों की प्राधनता है। यहाँ के कुल क्षेत्रफल का 25ः से भी कम क्षेत्र में वनों का विस्तार है। इसलिए यहाँ पुर्नजंगलीकरण की आवष्यकता है। साक्षरता के दृश्टिकोण से यह क्षेत्र काफी आगे हैं। परन्तु अन्य क्षेत्रों की तरह ग्रामीण साक्षरता दर षहरी साक्षरता दर से कम हैं। यहाँ के ग्रामीण जनसंख्या का पलायन गाँव से षहरों की और हो रहा है। इसलिए यहाँ जनसंख्या की समस्या के साथ-साथ षहरी क्षेत्र में जमीन भी काफी मँहगा हो गया है।
अतः यहाँ की भौगोलिक स्थिति को देखते हुए यहाँ की समस्याओं का समाधान करने की आवष्यकता है।

Keywords
जुम्मन यति, जलवायु, मिट्टी, वनस्पति
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