स्वस्थ्य जीवन का मूल है खेल शिक्षा

Vol-4 | Issue-03 | March 2019 | Published Online: 13 March 2019    PDF ( 138 KB )
Author(s)
डाॅ. कमला, (शिक्षा शास्त्र) 1
Abstract

शिक्षा जीवन का अनिवार्य हिस्सा होती है, लेकिन यदि वो केवल रोजगार के ही रास्ते खोलने की दिशा तय करती है तब उसे संपूर्ण शिक्षा नहीं माना जा सकता। शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो हमारा सर्वागींण विकास करे। पुरातन शिक्षा जंगल में प्रायोगिक तौर पर प्रमुखता से दी जाती थी लेकिन वर्तमान शिक्षा केवल कागजी ज्ञान होती जा रही है। शिक्षा में जब तक खेलों का प्रमुखता से समावेश नहीं होगा तब तक शिक्षा अपने मूल तक नहीं पहंुचेगी, वो उस गहरे ज्ञान से परिचित नहीं करवा पाएगी जिसकी आवश्यकता मानव, समाज, देश में हमेशा से रही है। शिक्षा में खेलों को प्रमुखता से स्थान देने पर न केवल वो सरल और सहज हो जाएगी बल्कि तनाव के साथ ही कई सारी बीमारियों से भी निजात मिल सकेगी। खेल हमारे जीवन में अनुशासन का पाठ पढाते हैं, ये हमें जीवन के प्रति उत्साह और खुशी का अहम सबक भी समझने में मददगार साबित होते हैं। मौजूदा समय में बीमारियां बढ़ती जा रही हैं, बच्चों से लेकर उम्रदराज लोगों तक सभी बीमारियों की चपेट में आ रहे हैं, इसके पीछे सीधा सा एक कारण है कि हमने शारीरिक श्रम को लगभग खत्म कर लिया है, यहां खेल महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। जब बच्चे खेल को जीवन का हिस्सा मान लेंगे तो उनका शरीर उस आवश्यक श्रम को कभी भी नहीं नकारेगा और बीमारियां भी उनसे दूर रहेंगी। खेलों के लिए शिक्षा में बेहद गंभीर होकर विचार करने की आवश्यकता है और इसे लेकर सुधार की शुरुआत आरंभिक शिक्षा से हो सकती है।

Keywords
शिक्षा, शारीरिक श्रम, समाज, देश
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