समकालीन हिंदी कहानियों में चित्रित महानगरीय जीवन
| Vol-2 | Issue-9 | September 2017 | Published Online: 15 September 2017 PDF ( 160 KB ) | ||
| Author(s) | ||
| डाॅं. विद्या शशिशेखर शिंदे 1 | ||
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1हिंदी विभाग प्रमुख, आय. सी. एस. काॅलेज, खेड रत्नागिरी |
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| Abstract | ||
स्वतंत्रता के पश्चात् धीरे -धीरे सामाजिक ढाॅंचा टूटता बिखरता जा रहा हैं. इस बीच जो नई परिस्थिति हमारे सामने आई हैं. उसने अनेक समस्याओं तथा विद्रुपताओं को जन्म दिया हैं. औद्योगिकीकरण, सहशिक्षा, अग्रेजियत एवं उसकी नग्न यंत्रवत पाशविक सभ्यता ने भारतीय जनमानस को ज्यादा प्रभावित किया हैं. गृहस्थ जीवन से लेकर साहित्य, कला, समाज, राजनीति, धर्म आदि सभी क्षेत्रों में कतिपय समस्याओं का जन्म हुआ. गृहस्थ जीवन को सुरक्षित रखनेवाली और अगली पीढी में मूल्य का सिंचन करनेवाली नारी इस परिवर्तन से विशेष प्रभावित हुई. स्वाधीनता के बाद औद्योगीकरण एवं शिक्षा से भारतीय समाज में उठी हलचल और उससे उत्पन्न समस्याएॅं समकालीन कथाकारों के लिए चुनौती बनकर आयी. जिसे अभिव्यक्त करना साहित्यकारों का दायित्व बन गया. इस बदलाव की विषम प्रक्रिया को व्यक्त करने में अनेक कथाकार जुड गये. उन्होंने साफ महसूस किया कि गाॅंव की तुलना में महानगरों की स्थिति अधिक गंभीर एवं सोचनीय हैं. पाश्चात्य सभ्यता के संक्रमण, अंधानुकरण एवं फैशनपरस्ती के परिणामस्वरुप नयं नयंे प्रतिमान उभर रहे हैं. इन्हीं प्रतिमानों को समकालीन साहित्यकारों ने वाणी देने का प्रयास किया हैं. |
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