विभूति नारायण राय के साहित्य की सौन्दर्य दृष्टि “वर्तमान साहित्य पत्रिका” के विशेष सन्दर्भ में

Vol-4 | Issue-12 | December 2019 | Published Online: 16 December 2019    PDF ( 102 KB )
Author(s)
सुधीर सैनी 1

1शोधार्थी, हिन्दी विभाग, राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर

Abstract

राय जी की सौन्दर्य दृष्टि का संबंध जहां एक ओर समाज विकास क्रम से सम्बद्ध हैं वहीं व्यक्ति और वस्तु के बीच द्वन्द्वात्मक संबंध का परिणाम हैं। वस्तुतः सौन्दर्य का संबंध मानव स्वभाव के चित्रण में निहित है। साहित्य का सबसे बड़ा सत्य मनुष्य हैं और मनुष्य तथा साहित्य का सार तत्व मुनष्य से प्रेम ही है। जनता के कर्म से और जन जीवन से जिस साहित्य की उत्पत्ति होती है उसी साहित्य का सौन्दर्य सच्चा सौन्दर्य होता है। राय जी की दृष्टि में हमारे मन में सुन्दरता अथवा कुरूपता के गुणों- अवगुणों की अनुभूति अपने आप केवल वस्तुओं को देखने या उनके बारे में सोचने मात्र से नहीं जाती बल्कि इन भावना का विकास संस्कृति और उत्पादन की क्रिया विकास के मध्य होता है। सौन्दर्य न तो केवल वस्तुपरक होता है और न केवल आत्मपरक, वह न तो वस्तु में उपस्थित होता है न उपभोक्ता की दृष्टि में बल्कि वह दोनों के बीच द्वन्द्वात्मक संबंध से पैदा होता। मनुष्य को वे तमाम वस्तुऐं, भावनाऐं, आकृतियाॅ और विचार सुन्दर लगते हैं जो उसके लिए उपयोगी और सार्थक है।

Keywords
संवदेन, शून्य, अबोध, समीक्षा, काव्य, संस्मरण, वैचारिकी।
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