लोकतांत्रिक विकेन्द्रीकरण का स्वरुप: एक दृष्टिकोण
| Vol-4 | Issue-01 | January-2019 | Published Online: 10 January 2019 PDF ( 127 KB ) | ||
| Author(s) | ||
| डाॅ. कुमकुम शर्मा 1 | ||
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1सहायक आचार्य, राजनीतिक विज्ञान विभाग, सेन्ट विल्फ्रेड पी.जी. काॅलेज, मानसरोवर ,जयपुर राजस्थान (भारत ) |
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| Abstract | ||
लोकतंत्र केन्द्रीयकरण में नही पनपता, वहा तो हिंसा का आवास होता है, लोकतंत्र विकेन्द्रीकरण में आवास करता है तथा अहिंसा के माध्यम से उसकी स्थापना की जा सकती है। किसी भी देश के लोगो के द्वारा शासन की भागीदारी केवल तभी संभव है। जब राज्य की शक्तियों को जिला, ब्लाॅक और ग्राम स्तर में विकेन्द्रिकृत की जाती है, जिससे समाज में सभी वर्ग एक साथ बैठ सकते है और अपनी समस्याओं पर चर्चा करने के साथ ही कार्यक्रमों के कार्यान्वयन की निगरानी कर सकते है। विकेन्द्रीकरण एक प्रमुख तंत्र जिसके माध्यम से लोकतंत्र सही मायने में प्रतिनिधिक और संवेदनशील हो जाता है। इस प्रकार इसे लोकतांत्रिक विकेन्द्रीकरण की जड़ कहा जाता है मूल्य भारित उपसर्ग, लोकतांत्रिक का जुडाव विकेन्द्रीकरण की अवधारणा को एक खास विशेषता प्रदान करता है। विकासशील देशों के संदर्भ में लोकतांत्रिक विकेन्द्रीकरण का दो अलग-अलग दृष्टिकोण से परिकल्पना की गई है अर्थात् संस्थागत और तंत्रात्मक। स्थानीय स्वशासन और लोकतांत्रिक विकेन्द्रीकरण दोनो एक दूसरे के पर्यायवाची है क्योंकि दोनो का मूल उद्देश्य शासन कार्यों में लोगों की अधिकतम सहभागिता और स्वायत्ता प्राप्त करना होता है।
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| Keywords | ||
| लोकतांत्रिक विकेन्द्रीकरण स्थानीय स्वशासन, लोकतंत्र पंचायतीराज, स्वराज्य, केन्द्रीकरण | ||
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