योग साधना हेतु शरीरस्थ पंचकोश की उपादेयता
| Vol-6 | No-01 | January-2021 | Published Online: 17 January 2021 PDF ( 129 KB ) | ||
| DOI: https://doi.org/10.31305/rrijm.2021.v06.i01.045 | ||
| Author(s) | ||
| श्रीमती ज्योति 1; कुसुम 2 | ||
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1शोध निर्देशक, सी.आर.एस.यू., जीन्द 2रोल नं. 203470, एम.ए. योग (योग विज्ञान विभाग), सी.आर.एस.यू., जीन्द |
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| Abstract | ||
योग की धारणा के अनुसार मानव का अस्तित्व पाँच भागों में बंटा है जिन्हें पंचकोश कहते हैं। विभिन्न कोशों में चेतन, अवचेतन तथा अचेतन मन की अनुभूति होती है। प्रत्येक कोश का एक-दूसरे के साथ घनिष्ट संबंध है तथा एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं। इन कोशों को जानने के बाद स्वयं की अनुभूति होती है। हमारे अन्तरात्मा में कई आवरण है। जिस कारण हमें आत्मा का दर्शन नहीं होता है। कोश हमारे शरीर में ऊर्जा का केन्द्र माने है तब हमारा शरीर ऊर्जामय, कान्तिमय व खिला-खिला सा लगता है। इसलिए इनको योगि योग-साधना से संतुलित करते हैं। ये पंचकोश हमारे स्थूल शरीर, सूक्ष्म शरीर तथा कारण शरीर तीनों में स्थित होते हैं, जब हमारे पंचकोश संतुलित होते है तो हमारे तीनों शरीर स्थूल, सूक्ष्म व कारण भी स्वयं ही संतुलित हो जाते है तथा हम अपने स्थूल के साथ-साथ सूक्ष्म व कारण शरीर को भी जान लेते हैं। इन कोशों में से एक कोश शरीर के बाहर अन्नमय कोश रहता है। अन्य चार शरीर के भीतर विद्यमान रहते हैं। जब हम योग साधना में बैठते हैं तो लक्ष्य की प्राप्ति तब ही हो सकती है जब हम अपने स्थूल के साथ-साथ सूक्ष्म व कारण शरीर को भी जान लेते हैं तथा ये हम योग साधना के द्वारा ही जान सकते हैं इसलिए योग-साधना एक सीढ़ी की तरह काम करती है। पंचकोशों का शरीर में अलग-अलग क्षेत्र है और भिन्न-भिन्न कार्य है इसलिए जब ये जाग्रत होते हैं तो शरीर के अलग-अलग हिस्सों पर भिन्न-भिन्न प्रभाव देखने को मिलेगा। जब हमारे पंचकोश जाग्रत होकर संतुलित रहते हैं तो हम भावनात्मक, शारीरिक, मानसिक व आध्यात्मिक रूप से भी संतुलित हो जाते हैं। मनुष्य के शरीर में पाँच ऊर्जा के स्तर होते हैं जो एक साथ विद्यमान रहते हैं इनका क्षेत्र होता है सर्वाधिक स्थूल से सर्वाधिक सूक्ष्म तक। इन्हें पंचकोश कहते हैं - अन्नमय कोश, प्राणमय कोश, मनोमय कोश, विज्ञानमय कोश एवं आनन्दमय कोश। हमारे पंच प्राण भी इसी पंचकोश सम्पदा के पाँच स्वरूप है। पंचकोश साधना में जप, तप, ध्यान, प्राणायाम, बंध, मुद्रा आदि का प्रयोग करना पड़ता है। इसके राजयोग, हठयोग, कर्मयोग, प्राणयोग, ऋतुयोग, ज्ञानयोग, भक्तियोग, कर्मयोग, तत्वयोग आदि चैरासी योगों के आधार पर अनेकानेक व्यायाम क्रम बताए गए है। साधक उन्हें अपनी पात्रता एवं परम्परा के अनुसार अपनाते हैं। योग साधक का उद्देश्य होता है एक-एक कर कोशों का भेदन करते हुए चेतना का उच्चतर स्तरों तक पहुँचना। अन्नमय कोश से लेकर आनन्दमय कोश तक एक-एक चक्र का भेदन करना तथा स्थूल से सूक्ष्म व कारण शरीर की तरफ बढ़ते रहना, विभिन्न योगियों ने भी यौगिक ग्रंथों में पंचकोशों की अलग-अलग महता बताई है। |
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| Keywords | ||
| अध्यात्म, चक्र, प्राण, योग साधना, कारण शरीर, सूक्ष्म शरीर, नाड़ियाँ आदि। | ||
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