मीडिया मीमांसा का गूढ़ार्थ : आध्यात्मिक सम्प्रेषण की महत्वपूर्ण भूमिका -अहिंसक जीवन शैली के संबंध में एक सामाजिक विश्लेषण

Vol-4 | Issue-01 | January-2019 | Published Online: 10 January 2019    PDF ( 409 KB )
Author(s)
मेधावी शुक्ला 1

1अनुसंधान अध्येता, गांधी एवं शांति अध्ययन विभाग, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा (भारत)

Abstract

प्रस्तुत्त शोध आलेख में अहिंसक जीवन शैली के व्यावहारिक पक्षों का सामाजिक विश्लेषण करते हुए स्पष्ट किया गया है कि जीवन में जब हम स्वयं के सकारात्मक परिवर्तन का स्वरुप गढ़ने का प्रयास करते हैं तब एक मनुष्य होने के नाते हमें यह आभास होता है कि स्वयं के लिए सामाजिक जीवन में शांति , अहिंसा का क्या महत्व है । सामाजिक जीवन को नई दिशा प्रदान करने में धर्म की सम्मति एवं आध्यात्मिक चेतना का कितना महत्व है यह बात राजयोग की उपादेयता से पूर्णतया स्पष्ट हो जाती है । अब प्रश्न उठता है कि एक मनुष्य के लिए समाज में सुख , शांति एवं आनंद को बनाए रखने के लिए अहिंसक जीवन शैली का किस स्तर पर उपयोग किया जाना अनिवार्य है क्योंकि अहिंसा परमो धर्म: एक कथनीय अभिव्यक्ति के साथ धारणा मूलक विचार भी है जिसे व्यक्ति धर्म कर्म की अभिव्यक्ति से अन्तःकरण को समझने का प्रयास करता है । व्यक्ति अध्यात्म के सहारे अपने स्वमान को जागृत करते हुए इस प्रकार से पुरुषार्थ करता है कि उसका आध्यात्मिक जगत किसी भी स्थिति में आत्मा के स्वमान को अखंड बनाए रख सकें ।अहिंसक जीवन शैली में राजयोग का अवदान अपनी परम्पराओं को इस प्रकार से अक्षुण्य बनाए रखता है ताकि राजयोग के स्वरुप का सही मूल्यांकन करना संभव हो सके । वर्त्तमान परिवेश में जब हम सम्प्रेषण की बात करते हैं तो एक दृष्टि में सब कुछ संप्रेषित कर दिया जाए इस बात का मानसिक तनाव और दबाव सम्प्रेषणकर्त्ता के ऊपर सामान्यतः होता है । दैनिक आपाधापी के बीच जो कुछ घटित हुआ अथवा संभावित परिणाम के पक्ष एवं विपक्ष में वह अपनी बेबाक टिप्पणी से समाज के सम्मुख अतीत , आगत एवं अनंत का ऐसा ख़ाका प्रस्तुत्त करता है जिससे उसकी क्रियाशीलता सामाजिक सक्रियता के सम्मुख अभिव्यक्ति के नित - नूतन आयाम को प्रस्तुत कर सके ।इस शोध आलेख में इस बात की पुष्टि की गयी है किमर्यादित सम्प्रेषण सामान्य तौर पर जीवन की विडंबनाओं से मुक्त रहता है और सामाजिक स्वीकृति के संदर्भ में इसे अत्यधिक ऊँचा ओहदा प्राप्त होता है । आध्यात्मिक सम्प्रेषण और मीडिया मीमांसा का गूढ़ार्थ इस बात पर बल देते हैं कि आध्यात्मिक जगत की ऊँचाई मानव जीवन - शैली को उसकी श्रेष्ठता से परिचित कराती है तथा अहिंसक जीवन जीने के लिए निरंतर प्रेरणा प्रदान करने का कार्य करती है जिससे आध्यात्मिक सम्प्रेषण में श्रेष्ठ जीवन शैली को स्वीकृत करते हुए सामाजिक उत्कृष्टता के प्रसंग में प्रतिपादित किया जा सके । धर्म ,अध्यात्म एवं राजयोग के संदर्भ को जब आध्यात्मिक सम्प्रेषण द्वारा समाज में परोसा जाता है तब मीडिया मीमांसा द्वारा धर्म - कर्म की महानता , अध्यात्म - पुरुषार्थ की वास्तविकता एवं राजयोग मौन की उपयोगिता को उसकीस्वाभाविक विशेषताओं के साथ इस प्रकार से विश्लेषित किया जाता है कि आम जन को इस बात की तहकीकात करने की गुंजाईश हो कि - आध्यात्मिक जगत की सम्पूर्ण प्रस्तुतियां क्या मानव जगत की धारणात्मक गतिशीलता को प्रमाणित करती हैं ? यदि हाँ तो वह कौन - सी स्मृतियाँ हैं ? जिससे मानव - समाज अपनी स्थिति को श्रेष्ठता के पायदान पर पहुंचा सकता है ।

Keywords
अहिंसक जीवन शैली, शांति, अहिंसा
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