मध्यकालीन भारत में वर्णित समाज
| Vol-5 | Issue-8 | August-2020 | Published Online: 17 August 2020 PDF ( 177 KB ) | ||
| DOI: https://doi.org/10.31305/rrijm.2020.v05.i08.033 | ||
| Author(s) | ||
| Dr. Shashi Kiran 1 | ||
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1Associate Professor (History) CISKMV Fatehpur Pundri, Kaithal (Haryana) |
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| Abstract | ||
भारत के सामाजिक इतिहास में वर्ण-व्यवस्था का महत्त्वपूर्ण स्थान है, जो समाज के विभाजन के रूप में वैदिक काल से लेकर वर्तमान तक समस्त भारत में निरन्तर विद्यमान है। इस व्यवस्था के अन्तर्गत भारतीय समाज को वर्णों में विभाजित किया गया था। इस विभाजन का मुख्य आधर रंग-भेद अथवा प्रजातीय विविध्ता ही थी। यद्यपि वैदिक कालीन समाज के इस विभाजन के अन्तर्गत यह व्यवस्था भी थी कि कोई भी व्यक्ति कार्य-प(ति, रुचि और मनःस्थिति के अनुसार अपना वर्ण-परिवर्तन कर सकता था, किन्तु ऐसा व्यवहारिक रूप से सरल भी नहीं था। किन्तु उत्तरवैदिक काल के परवर्ती युग तक आते-आते वर्ण-व्यवस्था का यह लचीलापन भी समाप्त हो गया। ‘वर्ण’ शब्द की व्युत्पत्ति संस्कृत के ‘वृ× वरणे’ अथवा ‘वरी’ धतु से हुई है, जिसका अर्थ है ‘चुनना’ अथवा ‘वरण करना’। ‘वर्ण’ और ‘वरण’ शब्दों में समानता भी यही दर्शाती है। संभवतः ‘वर्ण’ से तात्पर्य ‘वृत्ति’ अर्थात् किसी विशेष व्यवसाय के चुनने से है। |
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| Keywords | ||
| वर्ण-व्यवस्था वैदिक काल रंग-भेद | ||
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