भारतीय प्रशासन में नौकरशाही की भूमिका (समकालीन परिदृश्य में)
| Vol-4 | Issue-7 | July 2019 | Published Online: 15 July 2019 PDF ( 144 KB ) | ||
| Author(s) | ||
| Dr. Mahendra Singh Khichar 1 | ||
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1Principal, Vivekanand P.G. College, Sikar, Rajasthan (India) |
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| Abstract | ||
समकालीन समय में नौकरशाही की भूमिका में कई कारणों से बदलाव आया है। राज्य की बदलती भूमिका ने आज के संदर्भ में नौकरशाही की रूपरेखा में महत्वपूर्ण बदलाव दिखाई देता है। खुली अर्थव्यवस्था के साथ-साथ निजीकरण व सही आकार पर जोर के कारण नौकरशाहों की संख्या को कम करने का प्रयास हुआ है। इसके अलावा लगातार यह माँग भी होती रही है कि शासन -व्यवस्था उत्तरदायी, जवाबदेह व चुस्त-दुरूस्त हो। अतः बदलते परिदृश्य में, यह आवश्यक है कि नौकरशाही अपने आप में सुधार लाए। नौकरशाही के कई पहलू है, लेकिन कोई भी पारंपरिक नौकरशाही रूपरेखा का व्यवहारिक विकल्प नहीं उपलब्ध करा पाया है। तकनीकी तौर पर नौकरशाही का स्वरूप एक कुशल संगठन का रहा है, लेकिन आज यह अपनी प्रशासनिक शक्तियों की सीमा को पार कर गया है। यह इस संगठन के स्व-विवर्धन, रोजगार में स्थायित्व व राजनीतिक कार्यपालकों के ज्यादा नजदीक होने की प्रवृत्ति के कारण हुआ है। प्रशासन ने, जिसमें स्थायी और राजनीतिक कार्यपालिका शामिल है, कल्याणकारी राज्य की अवधारणा के आविर्भाव के बाद से ज्यादा उत्तरदायित्व ग्रहण किया है व नागरिकों की जरूरतों को ज्यादा प्राथमिकता दी है। स्वार्थी नौकरशाहों का स्थान उपयोगिता को बढ़ाने वालों ने ले लिया है, और इस कारण वेबर के द्वारा विकसित परपंरागत, श्रेणीबद्ध व नियमबद्ध नौकरशाही की अवधारणा की चारों ओर से काफी निंदा हुई है। |
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| Keywords | ||
| पेशेवर, निपंुजक, संस्थावाद, प्रत्यात्मक, प्राधिकारिक, प्रत्यायोजित, नवीन निरंकुशता | ||
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