भारतीय काव्य शास्त्रीय सिद्धांतों में प्रयुक्त ध्वनि सिद्धांत के व्यंगार्थों का भारतीय विज्ञापनों में प्रयोग (दस व्यंगार्थों और अंतर्जाल के अंतर्गत चुनित विज्ञापनों के माध्यम से)
| Vol-5 | Issue-4 | April-2020 | Published Online: 16 April 2020 PDF ( 180 KB ) | ||
| DOI: https://doi.org/10.5281/zenodo.3822224 | ||
| Author(s) | ||
डा. संगीत रत्नायक
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1वरिष्ठ अधिव्याख्याता, भाषा अध्ययन विभाग, सबरगमुव विश्वविद्यालय, बेलिहुल्ओय, श्रीलंका। |
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| Abstract | ||
प्रस्तुत शोधालेख में भारतीय काव्य शास्त्रीय सिद्धांतों के अंतर्गत ध्वनि सिद्धांत के व्यंगार्थों को भारतीय विज्ञापनों में कहाँ तक प्रयुक्त किया जा सकता है, उसका अध्ययन किया गया है। इस अनुसंधान के लिए दस व्यंगार्थों तथा अंतर्जाल के अंतर्गत भारतीय विज्ञापनों को आधार बनाया गया है। इसमें चुनित भारतीय विज्ञापनों में दस व्यंगार्थों का उपयोग कहाँ तक किया गया है, उस बात का निरीक्षण हुआ। निष्कर्ष यह निकला कि छः व्यगार्थों का- वक्तृ, बोधव्य, वाक्य, अन्यसन्निधि, देश, तथा चेष्टावैशिष्ट्योत्पन्न वाच्यसंभवा आर्थी व्यंजना - विज्ञापनों में प्रयोग हुआ है। उनमें से चार व्यंगार्थ- काकु, वाच्य, प्रस्ताव तथा कालवैशिष्ट्योत्पन्न वाच्यसंभवा आर्थी व्यंजना - विज्ञापनों में प्रयुक्त होते नहीं मिला। इस प्रकार यह निरीक्षण हुआ कि विज्ञापनों को आकर्षित बनाने के लिए साभिप्राय या निराभिप्राय व्यगार्थों का प्रयोग होता है। दस व्यंगार्थों में से चारों का प्रयोग न होने से यह तथ्य प्रकट होता है कि अंतर्जाल के अंतर्गत भारतीय विज्ञापनों में व्यंगार्थाें का पूरा प्रयोग नहीं हुआ है। व्यंगार्थों का पूरी तरह से प्रयोग करने से विज्ञापन अधिकाधिक सफल बन सकते हैं। |
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| Keywords | ||
| ध्वनि, व्यंगार्थ, विज्ञापन, दूरदर्शन। | ||
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