प्रकृति, पर्यावरण और हिंदी उपन्यास

Vol-5 | Issue-3 | March-2020 | Published Online: 16 March 2020    PDF ( 227 KB )
DOI: https://doi.org/10.5281/zenodo.3817306
Author(s)
रवि यादव 1

1शोध छात्र, हिंदी विभाग, कुमाऊँ विश्वविद्यालय, नैनीताल

Abstract

21वी सदी का दौर प्रतिस्पर्धा का दौर है. भूमंडलीकरण के बाद अर्थव्यस्थाओ की आपस में निर्भरता ने एक दूसरे के लिए दरवाजे खोल दिए. ऐसे में आर्थिक विकास की अंधी दौड़ शुरु हो गई है.पैसे की इस भूख ने विलासिता को जन्म दिया है. मानव का यह विलासिता पूर्ण जीवन प्राकृतिक संशाधनो को तेजी ख़त्म कर रहा है.तेजी से बढ़ता जनसँख्या दबाव ने संशाधनो के दोहन की इस गति को और तीब्र कर दिया है.मानव की इन अवश्यकताओ की पूर्ती के लिए अगर सबसे अधिक किसी ने कीमत चुकाई है तो वह है हमारा पर्यावरण ,हमारे आस पास का वातावरण,प्रकृति और उसपर निर्भर जीव जन्तुओ और प्राणियों ने .एक तरफ महानगरो में निवास करने वाले लोग पर्यावरण प्रदूषण की मार झेल रहे है तो दूसरी ओर प्रकृति की गोद में रह रहा आदिवासी समुदाय औद्योगिक कंपनियों की नव उपनिवेशवादी मॉडल की जद में आकर अपनी निजी भूमि पर पराया होता जा  जा रहा है.पर्यावरण निम्नीकरण की इन समस्याओ से निपटने के लिए सरकारी स्तर पर प्रयास जरी है . साहित्यिक कृतियों के माध्यम से भी रचनाकारों ने वस्तु स्थिति को प्रस्तुत करने और सुधार के लिए जागरूकता फ़ैलाने का कम किया है

Keywords
प्रकृति, पर्यावरण, भूमंडलीकरण ,हिंदी उपन्यास
Statistics
Article View: 1114