पूर्वी राजस्थान के कथात्मक लोकगीत (कन्हैया गायन के विशेष संदर्भ में)
| Vol-4 | Issue-11 | November 2019 | Published Online: 16 November 2019 PDF ( 114 KB ) | ||
| Author(s) | ||
| डाॅ. करतार सिंह 1; शिव सिंह 2 | ||
|
1सह आचार्य हिन्दी विभाग राजस्थान विश्वविद्यालय जयपुर (राज.) 2शोधर्थी, हिन्दी विभाग राजस्थान विश्वविद्यालय जयपुर (राज.) |
||
| Abstract | ||
“पूर्वी राजस्थान में लोकगीत का अलग ही प्रचलन है। यहां की संस्कृति में लोकगीत लोगों के कण्ठ में है जो कि खुशी के अवसर पर उद्गार होते है जैसे होली पर, दिवाली पर, बसंत पंचमी पर, गाँवों में विशेषकर लोगों द्वारा मनोरंजन व अपनी संस्कृति का व्यापक प्रसार इन लोकगीतों के माध्यम से होता है इन गीतों में आदिवासियों व ग्रामीण संस्कृति की विशेषतः झलक देखने को मिलती है। “पूर्वी राजस्थान में लोकगीतों में विशेषतः कथात्मक लोकगीतों का प्रचलन है और हमारा यहां कथात्मक से तात्पर्य हे कि जैसे रामायण, महाभारत, वेदों आदि व वर्तमान में प्रचलित ज्वलंत मुद्दों पर भी कथा के रूप में गीत गाये जाते हैं जिसमें किसी भी ग्रन्थ के एक प्रसंग को लेकर लोकगीतों की रचना की जाती गई है जैसे “नरसी रो मायरौ“ “राम वनवास“ राजा हरिशचन्द्र, द्रोपदी की बटलोई, शिव विवाह आदि जैसे प्रसंगों को लेकर कथात्मक लोकगीतों की रचना की गई है। कन्हैया गायन भी कथात्मक गीतों का एक प्रकार है। पौराणिक ग्रन्थों व वर्तमान मुद्दों को लेकर लोक कलाकार इसका गायन करते हैं, इसमें किसी भी एक प्रसंग को कथा के रूप में गाया जाता हैं जैसे-राम वनवास, सीताहरण, राजा हरिशचन्द्र, लव-कुश कथा, शिव विवाह, खेती-बाड़ी शिक्षा, बेटी बचाओ आदि। |
||
| Keywords | ||
| कथात्मक लोकगीत, कन्हैया गायन, गायन संस्कृति, आदि। | ||
|
Statistics
Article View: 772
|
||

