पाश्चात्य चिंतन में न्याय की अवधारणा

Vol-6 | Issue-08 | August-2021 | Published Online: 17 August 2021 PDF
DOI: https://doi.org/10.31305/rrijm.2021.v06.i08.027
Author(s)
Dr. Hukma Ram Suthar 1

1Associate Professor, Govt. PG Girls Collage, Barmer, Rajasthan

Abstract

न्यायिक अवधारणा सुकरात से लेकर आज तक नीतिशास्त्र, राजनीतिशास्त्र तथा विधिशास्त्र की केन्द्रीय समस्या रही है। सुकरात ने ही सर्वप्रथम यह प्रश्न उठाया था कि आखिर ’न्याय’ क्या है ? इसका एक कारण यह भी रहा है कि इतिहास के प्रत्येक काल में न्याय की अवधारणा की व्याख्या तत्कालीन समाज की प्रचलित मान्यताओं के अनुसार की गई थी। यूनानी चिन्तक अरस्तू भी दार्शनिक दासता को न्यायपूर्ण सिद्ध करता है, और प्रबुद्धकाल में भी महिलाओं की राजनीतिक सहभागिता को अस्वीकार किया जाता रहा है, और यह सब न्याय के नाम पर। अतः अन्ततोगत्वा ’न्याय’ का वास्तविक स्वरूप क्या है? यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न बना हुआ है।

Keywords
न्याय, राजनीतिक, संसाधनों, पाश्चात्य।
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