पश्चिमी उत्तर प्रदेष की शहरी एवम् ग्रामीण विधार्थियों की पर्यावरण जागरूकता का विष्लेषणात्मक अध्ययन
| Vol-4 | Issue-04 | April 2019 | Published Online: 15 April 2019 PDF ( 236 KB ) | ||
| Author(s) | ||
| हृदेष कुमार शर्मा 1; डा0 आर0 आर0 सिंह 2 | ||
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1Research Scholar, Mewar University 2Research Guide, Mewar University |
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| Abstract | ||
प्राचीन काल से ही अर्थात् सृष्टि के आरम्भ से ही मानव ने अपने आपको सितारों की छाँव में पाया, यहीं से उसमें अनुसन्धान की भावना का उदय हुआ और पर्यावरण के क्षेत्र में उन्होंने इतना गहन अध्ययन किया कि ब्रह्माण से सम्बन्धित सभी विचारणीय तथ्यों की एक-एक कर स्पष्ट करने का निरन्तर प्रयास जारी रखा जिसके आज मानव पर्यावरण, प्रकृति, ब्रह्माण्ड आदि से सम्बन्धित सभी तथ्यों पर अपने आँकड़े तथा उनसे सम्बन्धित शोधों के निष्कर्षों को सफलता की कसौटी पर खरा आंकता है। सृष्टि के प्रारम्भ से ही मानव प्रकृति के साथ तालमेल रखते हुए अपना जीवनयापन करते थे। प्रातःकाल उठते ही सभी लोग सूर्य नमस्कार से लेकर, जल अर्ध तक विधिवत रीतियों से सूर्य देवता के प्रति सम्मान का भाव रखते थे। ऊर्जा के स्त्रोत सूर्य को देवता मानकर कहा गया है - ‘सूर्यदेवोभव’ अर्थात् सूर्य को देवता समझो। सूर्य देवता भूमण्डल का जीवनदाता है क्योंकि बिना उसकी ऊर्जा के पृथ्वी पर किसी भी प्रकार का वन, वनस्पति, जीव, जन्तु की उत्पत्ति सम्भव नहीं है। और बिना वनस्पति जगत के जीव जगत की कल्पना करना कपोलकल्पित है। एते पृथिवि, स्योनमस्तु’’ (अथर्ववेद 12-1-12) रूद्र को वृक्ष और अरण्यों का स्वामी कहकर ‘वृक्षवा पतये नमो नमः‘ तथा ‘अरण्यानां पतये नमो नमः (यजुर्वेद 5-19-20) द्वारा उसका नमन किया।
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| Keywords | ||
| शहरी ग्रामीण पर्यावरण जागरूकता | ||
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