पंडिता रमाबाई सरस्वती का महिला सुधार हेतु योगदान

Vol-4 | Issue-11 | November 2019 | Published Online: 16 November 2019    PDF ( 194 KB )
Author(s)
डॉ. जय कुमार झा 1

1एसोसिएट प्रोफेसर, राजनीति विज्ञान विभाग, के॰ एस॰ कॉलेज, दरभंगा (बिहार)

Abstract

19वीं शताब्दी में भारतीय समाज सुधार आंदोलन के दौरान अनेक ऐसे बुद्धिजीवियों का उदय हुआ जिन्होंने भारतीय समाज व्यवस्था की सच्चाई को सामने लाने का प्रयास किया। इन समाज सुधारको में महिला व पुरुष दोनों ही उल्लेखनीय हैं। ज्ञातव्य है कि अंग्रेजों द्वारा भारतीय समाज की कमियां गिनाते समय महिलाओं की स्थिति को केंद्र में रखा जाता था। भारतीय समाज व्यवस्था को महिलाओं की गिरी हुई स्थिति के कारण ही बहुत ही निम्न कोटि का बताया गया जिसके फलस्वरूप भारतीय समाज सुधारको ने महिला सुधार हेतु प्रयास करना शुरू किए। लेकिन इन सबके बावजूद महिलाओं की इच्छाओं और आकांक्षाओं को कोई स्थान नहीं दिया गया था। समाज सुधारक अपने राजनीतिक प्रयोजन हेतु महिलाओं को शिक्षित करना चाह रहे थे लेकिन उनके इस प्रयोजन के परिणाम स्वरूप अनेक ऐसी महिलाएं उभर कर सामने आई जो पुरुष समाज सुधारकों के लक्ष्य से विपरीत जाकर महिलाओं की इच्छाओं और आकांक्षाओं को व्यक्त कर रही थी। पंडिता रमाबाई सरस्वती का नाम इन महिलाओं में प्रमुख रूप से लिया जाता है। पंडिता रमाबाई का जन्म एक ऐसे दौर में हुआ था जब भारत में महिलाओं की स्थिति बहुत ख़राब थी, दासों की तरह उनके साथ व्यवहार किया जाता था। पति की सेवा और बच्चों का पालन पोषण करना ही उनका कार्य होता था। अपनी इच्छा से वे कोई काम नहीं कर सकती थी उन्हें किसी भी प्रकार की कोई स्वतंत्रता प्राप्त नहीं थी। महिलाओं का जीवन घर की चारदीवारी तक ही सीमित था, यहाँ तक की पढ़ने लिखने की भी सख्त मनाही थी। छोटी उम्र में ही उनकी शादियां कर दी जाती थी वो भी अधेड़ उम्र के पुरुष के साथ जिसके कारण वो नाबालिग अवस्था में ही विधवा बन जाती थी, उस  समाज में बाल विधवाओं की बड़ी संख्या थी। पंडिता रमाबाई के पिता की शादी भी एक़ नौ साल की नाबालिग के साथ हुई थी जब की उनकी उम्र उस समय 40 साल थी।

Keywords
समाजसुधार, महिला शिक्षा, हिंदू महिला, पंडिता रमाबाई सरस्वती।
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