दार्शनिक और वैज्ञानिक चिंतन में मानव चेतना

Vol-5 | Issue-8 | August-2020 | Published Online: 17 August 2020    PDF ( 389 KB )
DOI: https://doi.org/10.31305/rrijm.2020.v05.i08.047
Author(s)
Santosh Rani 1

1M.A. Yoga (Net),Dept. of Phy.Education, Chaudhary Ranbir Singh University, Jind

Abstract

वैदिक क्षेत्र और वैज्ञानिक क्षेत्र दोनों में चेतना को गहन अन्वेषण हुआ। चेतना का विषय भारतीय वेदों, दर्शनों, शास्त्रों और उपनिषेदों से जुड़ा विषय है। वैदिक साहित्य में चेतना का वर्णन किया गया, इसलिए चेतना को सांस्कृतिक परिपेक्ष्य में समझा है ना कि पाश्चात्य विद्वानों के मन्तव्यों के आधार पर चेतना ब्राह्माण्ड में छिपी हुई वह अद्भुत शक्ति है, जिससे प्रत्येक वस्तु स्पंदित होती है छोटे से छोटे जीव या अणु से लेकर कण-कण में पेड़-पौधे मनुष्य, नदी, समंदर, मनुष्य, हर कुदरती वस्तु अन्तरिक्ष के अन्दर, जल के अन्दर रहने वाले जीवों में जो स्पंदन है वह चेतना ही है। चेतना को समझने के लिए भारतीय वेदों, दर्शन शास्त्रों का अध्ययन करना विशेष आवश्यक है। न केवल पाश्चात्य विचार धारा से इसको समझा जा सकता। भारतीय साहित्य में बताया गया है अणु से लेकर विभु तक सब जगह चेतना ही है, मनुष्य जीवन में जो सुख और दुख की जो अनुभूति चेतना के कारण ही होती है। सामान्य रूप में चेतना का अभिप्राय चैतन्यता सजीवता आदि से है। चेतना के कारण सृष्टि के प्रत्येक कण-कण में स्पंदन, परिवर्तन और गतिशीलता दिखाई पड़ती है। सृष्टि की प्रत्येक वस्तु में चेतना है, चाहे वह वस्तु सजीव हो या निर्जीव परंतु भारतीय साहित्य में मनुष्य में चेतना के स्तर को उच्च बताया गया है।

Keywords
चेतना, अनात्मावाद, क्षणिकवाद, जीवात्मा समष्टि-व्यष्टि, अन्तर्निक्षण, मन बुद्धि, जाग्रत, सुषुष्ति, अहंकार, चित बोध
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