तीन पीढ़ियों की संघर्ष कथा : दोहरा अभिशाप
| Vol-5 | Issue-8 | August-2020 | Published Online: 17 August 2020 PDF ( 419 KB ) | ||
| DOI: https://doi.org/10.31305/rrijm.2020.v05.i08.040 | ||
| Author(s) | ||
बृज किशोर वशिष्ट
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1एसोशिएट प्रोफेसर, मोतीलाल नेहरू कॉलेज (सांध्य), दिल्ली विश्वविद्यालय |
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| Abstract | ||
कौसल्या बैसंत्री कृत ‘दोहरा अभिशाप’(1999) हिंदी में किसी महिला दलित साहित्यकार की पहली आत्मकथा है। यह आत्मकथा इस अर्थ में महत्त्वपूर्ण है कि लेखिका ने अपने जीवन के 68 वर्ष बीत जाने के बाद इसे लिखना आरंभ किया। नागपुर रेलवे स्टेशन के पास खलासी लाइन नाम की बस्ती में कौसल्या जी का जन्म 8 सितंबर, 1926 को हुआ। इससे पहले लेखिका के पास समाज सेवा के अनुभव तो थे लेकिन लिखने का कोई पूर्व अनुभव उन्हें नहीं था। उन्हें एक साथ तीन चुनौतियों से से पार पाना था - एक, पति के साथ चार दशक से भी अधिक बिताने के बाद, तरह-तरह की यातना सहने के बाद अपने आपको यह विश्वास दिलाना था कि वे किसी भी तरह उससे कम नहीं हैं। दो, विभिन्न जातियों में विभाजित समाज के कुंठाग्रस्त संयोजन में अपनी बराबरी सिद्ध करनी थी और तीन, साहित्य में अपनी आत्मकथा के माध्यम से स्वीकार्यता हासिल करनी थी। कुछ सीमाओं के बावजूद वे काफी हद तक इन तीनों मोर्चों पर सफल रही हैं। |
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| Keywords | ||
| दलित, स्त्री, जाति, छूआछूत | ||
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Statistics
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