ग्रामीण हिन्दी उपन्यास: संरचनात्मक आयाम

Vol-2 | Issue-8 | August 2017 | Published Online: 28 August 2017 PDF
Author(s)
Dr. Rekha Mishra 1

1Lecture (Hindi) Government College, Newai (Tonk), Rajasthan

Abstract

उपन्यासों के रचनात्मक रूप में सभी तत्व पारस्परिक रूप से अविभाजित होते हैं। कथ्य, परिवेश, पात्र, शिल्प सभी एक दूसरे से गुंथे हुए हैं एवं इनका सौन्दर्य परस्पर पूरक है। ग्रामीण उपन्यासों में परिवेश के जीवन का यथार्थ, वहाँ की संवेदनाएँ, परिवेश के सुख-दुख, रचनाकार के अनुभवों के आधार पर शिल्प के माध्यम से अभिव्यक्त हुआ है। इन उपन्यासों के पात्र और भाषा भी उपन्यास के परिवेश को गति प्रदान करती हैं। नगरीय परिवेश में भौतिकतावादी बौद्धिकता के कारण वहाँ का जीवन यांत्रिक हो गया है जबकि ग्रामीण परिवेश में जीवन की संवेदनाएँ अभी बची हुई हैं। इन उपन्यासों में ग्राम संबंधी परिवेश, बिम्ब चित्र, संवेदनाएँ और आत्मीयता के रस, सब कुछ है यदि नहीं है तो थोपी हुई नाटकीयता। नाटकीयता का बाहरी मुलम्मा अधिक दिन तक ठहर नहीं पाता। उपन्यासकार इन्हीं अनुभूतियों का उपयोग कथ्य की संरचना में करता है जिसके कारण रचना में विविधता के दर्शन होते हैं। रचनाकार ऐसे परिदृश्य का जो स्वयं लेखक का भोगा हुआ सत्य है उसे संरचना के स्तर पर प्रयुक्त करता है तो उसका शिल्प उसी सांचे में ढल जाता है।

Keywords
ग्रामीण, उपन्यास, कथ्य, परिवेश, पात्र, शिल्प।
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