किन्नरों की मानसिक व्यथा : ‘मैं पायल’ उपन्यास के परिप्रेक्ष्य में

Vol-6 | Issue-08 | August-2021 | Published Online: 17 August 2021    PDF ( 245 KB )
DOI: https://doi.org/10.31305/rrijm.2021.v06.i08.002
Author(s)
डॉ.जिन्सी मैथ्यू 1

1सरकारी अतिथि अध्यापिका, कैथोलिक्केट कॉलेज, पत्तनमतिट्टा

Abstract

आज का समय विमर्शें का समय है। बहुकेंद्रीय का समय है। स्त्री, दलित अल्पसंख्यक वृद्ध और आदिवासी समुदाय परिधि को छोडकर केन्द्र में आ चुके हैं और अपने मूलभूत मानवाधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे हैं। किन्नर समुदाय भी हाशियापरक ज़िन्दगी को छोडकर अपने अधिकारों केलिए लड रहा है। यह एक ऐसा समुदाय है जो समाज के बीचों बीच उपस्थित है लेकिन उसका कोई अस्तित्व नहीं। रामायण और महाभारत काल से ही समाज में इस समुदाय की उपस्थिति दर्ज है पर ‘सभ्य समाज’ में तिरस्कार और अपमान का दंश झेलने के लिए विवश है। किन्नर उपहास का पात्र बनते हैं। लेकिन उनका मज़ाक उडानेवाले उनकी पीडा को नहीं समझते।

Keywords
हिजड़ा, किन्नर, तृतीयलिंग, पितृसत्तामक, अस्तित्व, जिजीविषा।
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