कविता के नये इलाके
| Vol-4 | Issue-6 | June 2019 | Published Online: 12 June 2019 PDF ( 142 KB ) | ||
| Author(s) | ||
सत्यनारायण कुमार
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1शोधार्थी, हिन्दी विभाग, तिलकामांझी भागलपुर विष्वविद्यालय, भागलपुर, बिहार, भारत |
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| Abstract | ||
कविता साहित्य का संवेदनशील विधा है। शायद इसी कारण बाज़ारीकरण ने कविता के सामने कई चुनौतियाँ व संघर्ष के रूप में पैदा की है। कविता के इन्हीं चुनौतियों और संघर्षों को अरुण कमल ने अपनी कविताओं में उकेरना का काम किया है। चूँकि अरुण कमल (मूल नाम-अरुण कुमार उपाध्याय) एक माक्र्सवादी विचारधारा के संवाहक कवि हैं, प्रगतिशील व समकालीन भी हैं। इनकी काव्य-यात्रा बेहद रोचक है। यों तो इनकी सारी कविताएँ समकालीन संवेदना से लवरेज़ है, पर ’नये इलाके में‘ की कविता की अपनी दुनिया है, अपने रंग-ढंग हंै। मुझे लगता है समकालीन वातावरण में घटित घटनाओं, उभरती सामाजिक संवेदनाओं, विचारों आदि को ’नये इलाके में‘ झाँकने का प्रयास है। यह तभी संभव हो सकता है जब कवि नये इलाके में खड़ा होगा। तटस्थ होगा। कवि आशंकित है अपनी आज़ादी को लेकर। उन्हें लगता है कि हमारे पूर्वजों द्वारा दी गई कुर्बानी सार्थक नहीं हुई है अब तक। कारण कि समानता की बात केवल राजनयिकों की काग़जी घोड़ा है। आज भी वही वेदना, वही हक़मारी, वही चित्कार है। नये इलाके में खड़े होने की जिद और वहाँ से कुछ हासिल करने की आकांक्षा कवि को ठूँठ बना दिया है- “नोक महीन से महीन करने की जिद में इतना छीलता गया पेंसिल कि अंत में हासिल रहा ठूँठ।” |
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| Keywords | ||
| नये, इलाके, माक्र्सवादी विचारधारा, अरुण कमल | ||
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