अमृतलाल नागर जी के उपन्यासों में मिश्रित भारतीय संस्कृति की झलक
| Vol-6 | Issue-09 | September-2021 | Published Online: 15 September 2021 PDF ( 161 KB ) | ||
| DOI: https://doi.org/10.31305/rrijm.2021.v06.i09.028 | ||
| Author(s) | ||
| डाॅ0 पिंकी शर्मा 1; डाॅ0 ममता सिंह 2 | ||
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1पूर्व शोध छात्रा, आगरा काॅलेज, आगरा। 2एसोसिएट प्रोफेसर, आगरा काॅलेज, आगरा। |
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| Abstract | ||
अमृतलाल नागर जी की गणना महान उपन्यासकारो में की जाती है। नागर जी विषुद्ध भारतीय थे उनको अपनी भारतीय संस्कृति से विषेष प्रेम था। उनके विचार से मानवीय चेतना का विकास करना ही भारतीय दर्षन कला और साहित्य का प्रतिपाद्य विषय रहा है। संस्कृति में मानव जीवन एंव समाज में समन्वयवादी मूल्य व्यापक स्तर पर दिखाई देते हैं। नागर जी की भारतीयता भी व्यक्ति एवं समाज के अन्योन्याश्रित सम्बन्ध को स्वीकार करती है। ठीक उसी प्रकार जैसे बूंँद और समुद्र का सम्बन्ध। दोनों का एक दूसरे के अभाव में अस्तिव्त ही नहीं जिस प्रकार एक-एक बूँद के मिलने से समुद्र का अस्तित्व बनता है उसी प्रकार एक -एक व्यक्ति के मिलने से समाज अस्तित्व ग्रहण करता है। इसी प्रकार नागर जी के समस्त उपन्यासों में भारतीय संस्कृति की झलक विभिन्न रूपों को दर्षाती है। |
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