स्वातंत्रयोत्तर हिन्दी गीतिनाट्य का शिल्प-सौन्दर्य
| Vol-3 | Issue-03 | March 2018 | Published Online: 30 March 2018 PDF ( 123 KB ) | ||
| Author(s) | ||
| डाॅ0 अशोक कुमार 1 | ||
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1उच्च माध्यमिक शिक्षक |
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| Abstract | ||
सामान्यतः हिन्दी पाठकों में यह धारणा प्रचलित है कि गीति नाट्य का संबंध सौंदर्ययुक्त भावनाओं से है। उसका संबंध जीवन की कठोर भाव-भूमि से नहीं होता। संभवतः यह धारणा इसके अंग्रेजी साहित्य में प्रचलित शब्द ‘लिरिक’ से संबंध रखनें के कारण उपजी है। वस्तुतः सृजनशीलता देश-काल सापेक्ष होती है। इसमें युगबोध की उपेक्षा नहीं की जा सकती। इसलिए जब हमारा देश आजाद हुआ तो साहित्य का कलेवर भी बदला और उसने युनानुरूप सत्य के संधन का मार्ग खोजना शुरू किया। कोमल भावनाओं के प्रस्तोता रचनाकारों को भी जब समाज में संघर्ष और तनाव की स्थिति दिखी तो उससे वे प्रभावित हुए बिना न रह सके। कुछ ने व्यंग्यात्मक रचनाएँ लिखी तो कुछ ने प्राचीन संदर्भों को मिथक रूप में स्वीकार किया और अपने अंदाज में उसे यथार्थवादी जामा पहनाया। स्वातंत्रयोत्तर गीति नाट्यकारों ने कविता और नाटक की संश्लिष्ट रचनाएँ प्रस्तुत की जिनमें धर्मवीर भारती का ‘अंधायुग’, नरेश मेहता का ‘संशय की एक रात’, गिरिजा कुमार माथुर का ‘कल्पांतर’, जानकी वल्लभ शास्त्री का ‘पाषाणी’ आदि के नाम उल्लेखनीय हैं। ये सभी कृतियाँ मिथकीय आधार पर निर्मित हैं। आधुनिक संवेदना के गायक इन रचनाकारों ने अपने भाव संप्रेषण के लिए जिन कथा-प्रसंगों को चुना है वे प्राचीन पौराणिक आख्यानों या मिथकों से संबंधित है। प्रस्तुत शोध-आलेख में इन्ही तथ्यों को उपस्थापित किया गया है। |
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| Keywords | ||
| सृजनशीलता, सौंदर्ययुक्त | ||
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