सदियों के दर्द का पुनराख्यान: जूठन

Vol-4 | Issue-02 | February 2019 | Published Online: 20 February 2019    PDF ( 522 KB )
Author(s)
बृज किशोर वशिष्ट 1

1एसोशिएट प्रोफेसर, मोतीलाल नेहरू कॉलेज (सांध्य), दिल्ली विश्वविद्यालय , दिल्ली, भारत

Abstract

ओमप्रकाश वाल्मीकि की आत्मकथा ‘जूठन’ इस अर्थ में विशिष्ट आत्मकथा है कि वह हिंदी दलित आत्मकथाओं में आरंभिक आत्मकथाओं में से एक होने के बाद भी अपने समय और समाज के वास्तविक बिंब उकेरती है। इसमें मनुष्य की अवमानना के अनेक रूपों को देखा जा सकता है। इस आत्मकथा की सफलता इस अर्थ में भी है कि इसमें अभिव्यक्त मनुष्य का दर्द व्यक्तिगत पीड़ा के एहसास से आरंभ होकर अंततः एकताबद्ध इकाई के रूप में परिणत होता है। लेखक के निजी दुखों के अनुभव व्यक्तिगत अभिव्यक्ति से ऊपर उठकर दलित मुक्ति आंदोलन के अस्त्र बनते दिखाई देते हैं। इसके लेखक में सत्य कहने का साहस, ब्राह्मणवाद का विरोध करने की क्षमता और श्रेष्ठताग्रंथि के विरोध में आवाज़ उठाने की शक्ति है। लेखक की यही विशेषताएँ उसे समता के पक्ष में खड़े रहने का अडिग साहस देती हैं।

Keywords
जूठन, जाति, अस्पृश्यता, आत्मकथा
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