विवेचित लेखिकाओं के उपन्यासों में बिम्ब एवं प्रतीक विधान एक अध्ययन
| Vol-4 | Issue-11 | November 2019 | Published Online: 16 November 2019 PDF ( 142 KB ) | ||
| Author(s) | ||
| गिरजेश कुमार 1 | ||
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1शोधार्थी हिन्दी विभाग राजस्थान केन्द्रीय विश्वविद्यालय किशनगढ़, अजमेर (राज.) |
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| Abstract | ||
हिन्दी समीक्षा में ’बिम्ब शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने अपने ’भाव और मनोविकार’ शीर्षक निबन्ध मंे किया। शुक्ल के अनुसार ’बिम्ब योजना विभाव के अन्तर्गत होती है, चित्रण उसका मूल धर्म है। इसकी दूसरी विशेषता है संश्लिष्ट रूपविधान। बिम्ब व्यक्ति या विशेष का होगा, सामान्य या जाति का नहीं। काव्य का काम कल्पना में (बिम्ब) (इमेज) या मूर्तभावना उपस्थित करना है, बुद्धि के सामने कोई विचार (कंासेप्ट) लाना नहीं। आलोचक अमरनाथ इस सन्दर्भ में लिखतें हैं कि बिम्ब का पुण्य कार्य संप्रेषणीयता है। वह कलाकार की अनुभूति और प्रभाता के बीच संबंध स्थापित करने वाला सूत्र है। वह विषय को स्पष्ट करता है, दृश्य भाव या व्यापार को समृद्ध करता है। कवि की अनुभूति को तीव्र बनाता है और पाठक में ऐसी संवेदना पैदा करता है जिसकी उपलब्धि नित्यप्रति के जीवन में नहीें होती। उपन्यास जैसी विधा में ऐन्द्रिय बिम्बों का प्रयोग होता है। दृश्य, सव्य, स्पृश्य, शोध एवं रूपगत बिम्बन ऐन्द्रिक बिम्बों के अन्तर्गत आते हैं। |
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| Keywords | ||
| संश्लिष्ट, मूर्तभावना, संप्रेषणीयता, प्रभाता, ऐन्द्रिय, सव्य, रूपगत, प्रतिकृति, भावावेश | ||
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