लोक जीवन में विद्यापति की प्रासंगिता एवं विशेषताओं का परवर्ती पीढियों पर प्रभाव

Vol-4 | Issue-5 | May 2019 | Published Online: 25 May 2019    PDF ( 246 KB )
Author(s)
स्वाति चैधरी 1; डॉ. ब्रजलता शर्मा 2

1शोधार्थी मानविकी एवं हिंदी विभाग हिमालयन गढ़वाल विश्वविद्यालय

2शोध निदेशक मानविकी एवं हिंदी विभाग हिमालयन गढ़वाल विश्वविद्यालय

Abstract

महाकवि विद्यापति के जन सरोकार, जनचेतना, भावनात्मक उत्कर्ष, अनुभूति की सूक्ष्मता का परिचय सही अर्थों में उनकी पदावली ही देती है, जो लोकभाषा में लिखी गई है। उनकी संस्कृत रचनाएँ तो उनके पाण्डित्य की द्योतिका हैं। पदावली की रचनाएँ मोटे तौर पर दो तरह की हैंदृएक भक्तिपरक और दूसरी पे्रमपरक। भक्तिपरक रचनाओं के आधार पर विद्वानों में उन्हें शैव,शाक्त, वैष्णव आदि तरह-तरह के सम्प्रदाय में बैठाने का मतभेद चलता रहा है, शायद समग्रता से विद्यापति का मूल्यांकन न कर पाने की स्थिति में यह मतभेद चलता ही रहेगा। शृंगारिक रचनाओं में भी उनके फलक काफी विस्तृत और बहुमुखगामी हैं। पर सारी स्थितियों के साथ जो एक विशेषता सर्वनिष्ठ है, वह है इन रचनाओं की गीतिमयता। गेयधर्मिता का यह उत्कृष्ट समायोजन महाकवि के अनूठे शिल्प का दर्शन कराता है। विद्वानों की बैठक से लेकर चूल्हे-चैके तक, गृहस्थों की मण्डली से लेकर साधुओं के समुदाय तक, भक्तों-पुजारियों से लेकर प्रेमी-प्रेमिका के प्रणय तक में यदि विद्यापति के गीत इतने प्रसिद्ध, प्रशंसित और मनोहारी हैं, लोक कण्ठ में बसी हुई सांस्कृतिक चेतना की तरह प्रिय हैं, तो इसके प्रमुख कारणों में से गीतिमयता का महत्त्व कम नहीं है। महाकवि के ये गीत शब्दानुशासन, छन्दानुशासन पर इनकी गहरी पकड़,उनके जन सरोकार तथा प्रामणिक जीवनानुभूति को तो उजागर करते ही हैं, संगीत शास्त्रा पर उनके नियन्त्रण को भी उद्भाषित करते हैं। और इन सबों के संयुक्त प्रभाव का ही फल है कि विद्यापति के गीत भावक के मन पर जादू का असर छोड़ते हैं। अतः प्रस्तुत शोध में लोक जीवन में विद्यापति की प्रासंगिता एवं विशेषताओं का अध्यन किया गया है एवं साथ साथ इसका परवर्ती पीढियों पर पड़ने वाले प्रभाव का अध्यन किया गया है

Keywords
महाकवि विद्यापति जनचेतना, भावनात्मक उत्कर्ष
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