राजस्थान में उपाश्रयी (सबाॅल्टर्न) इतिहास लेखनः भील जनजाति के विशेष सन्दर्भ में
| Vol-4 | Issue-8 | August 2019 | Published Online: 16 August 2019 PDF ( 267 KB ) | ||
| Author(s) | ||
| निर्मल शर्मा 1 | ||
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1वरिष्ठ शोधार्थी इतिहास एवं भारतीय संस्कृति विभाग राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर |
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| Abstract | ||
आदिवासी हमारे देश के मूल निवासी हैं। प्राचीन भारतीय सभ्यता, संस्कृति एवं इतिहास की बहुमूल्य धरोहर के रूप में इन्होंने अपना ‘आदिरूप’ प्राचीन से अर्वाचीन युग तक संजोकर रखा है। अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक परम्पराओं, धार्मिक विश्वास, राजनीतिक प्रणाली एवं सामाजिक रीति-रिवाजों के कारण अन्य समाजों से इनका पृथक अस्तित्व रहा है। जंगल में रहने के कारण यह लोग समाज की मुख्य धारा से अलग रहे हैं। अतः ऐतिहासिक सन्दर्भ में भी इनको उपेक्षित रहना पड़ा। भारतीय आदिवासी समुदायों पर लेखन की शुरूआत औपनिवेशिक दौर मे आरम्भ हुई। 1970 के दशक में इतिहास लेखन में एक नया समूह उभर कर सामने आया, जो सबाॅल्टर्न स्टडीज कलेक्टीव (ग्रुप) कहलाया। यह दक्षिणी एशियाई विद्वानों का समूह था। भारत में इस समूह के प्रमुख इतिहासकार रणजीत गुहा रहे हैं। उपाश्रयी इतिहास लेखन के अन्तर्गत समाज के निम्न वर्ग, आदिवासी वर्ग, किसान-मजदूर वर्ग, महिला वर्ग इत्यादि को प्रमुखता प्रदान की जाती है जो अभिजात्य वर्ग की श्रेणी में शामिल नहीं होते हैं। उपाश्रयी इतिहास लेखन में जनजातियों की संस्कृति, राष्ट्रीय आन्दोलन में इनके महत्व को रेखांकित किया गया है। राजस्थान में अनेक जनजाति समूह निवास करते हैं। इनमें भील जनजाति प्रमुख है। अतः प्रस्तुत शोध प्रबन्ध में उपाश्रयी इतिहास लेखन में जनजातियों का महत्व को रेखांकित करते हुए राजस्थान में जनजातियों के सन्दर्भ में किये गये उपाश्रयी इतिहास लेखन को भील जनजाति के विशेष सन्दर्भ में स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है। |
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| Keywords | ||
| सबाॅल्टर्न, कलेक्टीव, उपाश्रयी, स्टडीज, अभिजात्यवाद, ट्राईब, उपत्यकाओं | ||
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