यथार्थबोध और स्वातंत्रयोत्तर गीतिनाट्य
| Vol-3 | Issue-03 | March 2018 | Published Online: 30 March 2018 PDF ( 117 KB ) | ||
| Author(s) | ||
| डाॅ0 अशोक कुमार 1 | ||
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1उच्च माध्यमिक शिक्षक |
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| Abstract | ||
यथार्थवादी साहित्य के अन्दर युग-सत्य की नहीं अपितु उसके स्तर विश्ेाष की भी अभिव्यक्ति होती है। परिस्थितियों के अनुसार जो कविता कभी महान समझी जाती थी वह आज केवल अच्छी समझी जाती है और आज से बीस अथवा पचास वर्ष बाद उसकी क्या स्थिति होगी कोई कह नही सकता। किसी भी साहित्य का मूल्यांकन हम उसकी लोकप्रियता के आधार पर करते हैं तथा उसकी ख्याति के द्वारा उससे परिचय प्राप्त करते है। परन्तु पूर्ववर्ती साहित्य का मूल्यांकन इस रीति से थोड़ा कठिन होगा। आज से तीन सौ वर्ष पूर्व जो साहित्य रचा गया था, और उस समय उसकी जो लोकप्रियता एवं प्रशंसा थी वह सम्भव नहीं, क्योंकि आज से तीन सौ वर्ष वहाॅ एक ऐसा समाज था जो बहुसंख्यक जनसमूह के शोषण पर अपना जीवन व्यतीत करता था, जैसे कि आज का हमारा अमरिकी समाज है। स्तर जो एक मात्र सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और नैतिक गुणों का माप है, अपने विषय के परिवर्तन के साथ-साथ परिवर्तित होता रहता है। |
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| Keywords | ||
| यथार्थवाद, अभिव्यक्ति, मूल्यांकन | ||
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Statistics
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