भारत की विदेश नीति पर कोविड-19 का प्रभाव
| Vol-6 | Issue-10 | October-2021 | Published Online: 13 October 2021 PDF ( 805 KB ) | ||
| DOI: https://doi.org/10.31305/rrijm.2021.v06.i10.011 | ||
| Author(s) | ||
कांता वर्मा
1
|
||
|
1सहायक प्राध्यापक (राजनीति विज्ञान) शासकीय महाविद्यालय, लांजी जिला-बालाघाट (म.प्र.) |
||
| Abstract | ||
दुनिया के लिए महामारी द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से सबसे विनाशकारी घटना रही है। महामारी के साथ-साथ कई भू-राजनीतिक मुद्दों के कारण पहले से जटिल दुनिया अब और भी अधिक जटिल हो गई है। इसके अंतर्राष्ट्रीय प्रणाली में असंतुलन बढ़ा दिया है। इसकी दूसरी वास्तविकता यह है कि आज बहुध्रुवियता, पहले की तुलना में अधिक प्रासंगिक है। महामारी में आपूर्ति श्रृंखला में विविधता तथा लचीलापन लाने के महत्व के साथ-साथ भू-राजनीति के आर्थिक परिणामों तथा शक्ति के केंद्रीकरण के प्रयासों से जुड़े जोखिम को सामने ला दिया है। भारत हमेषा वसुधैव कुटुम्बकम के प्राचीन दर्शन पर चला है। आज खुले समाज और लोकतांत्रिक भावनाओं और विश्व मंच पर हमारी जिम्मेदारियों का संज्ञान है। महामारी के दौरान भारत ने विषेष रूप से पैरासिटाॅमाॅल व हाइड्रोक्सी क्लोरोक्वीन की मांगों को पूरा करने हेतु अपने दवा उत्पादन क्षमता को बढ़ाया। 150 से अधिक देशों को दवाएं दी, जिनमें आधे से अधिक मुफ्त या गैर-वणिज्यिक थी। पड़ोसी 4 देशों में हमने अपने चिकित्सा दल तैनात किये। इससे पूरे विष्व को संदेश जाता है कि भारत में न केवल खुद की मदद करने की बल्कि अच्छे अंतर्राष्ट्रीय संबंधों को बनाने की क्षमता है। प्रधानमंत्री मोदी जी ने आत्मनिर्भर भारत का आव्हान किया है, जो दुनिया के लिए महत्वपूर्ण है। लेकिन कोविड-19 की दूसरी लहर के बाद विदेशी सहायता भी स्वीकार करनी पड़ी है। महामारी के भीषण परिणामों के कारण क्षेत्रीय प्रधानता और नेतृत्व क्षमता पर प्रश्नचिन्ह खड़े हुये, जिसका नतीजा ये है कि आने वाले वर्षों में भारत की विदेश नीति के स्वास्थ्य पर भी प्रभाव पड़ेगा। |
||
| Keywords | ||
| ज्ञमलूवतकेरू पैरासिटाॅमाॅल, महामारी, वसुधैव कुटुम्बकम | ||
|
Statistics
Article View: 495
|
||


