भारतीय संविधान एवं समान नागरिक संहिता की प्रासंगिकता
| Vol-5 | Issue-05 | May 2020 | Published Online: 15 May 2020 PDF ( 218 KB ) | ||
| DOI: https://doi.org/10.31305/rrijm.2020.v05.i05.028 | ||
| Author(s) | ||
अनुराग तिवारी
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1शोधार्थी, मालवीय शांति अनुसंधान केंद्र, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी |
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| Abstract | ||
भारतीय समाज में समान नागरिक संहिता एक संवेदनशील मुद्दा बना हुआ है। इसके विवाद के मूल कारण में धार्मिक या व्यैक्तिक विधि को खारिज कर एक एकीकृत विधि का निर्माण करना है, जो देश के सभी व्यक्तियों के लिए एक समान विधि के रूप में मान्य होगा। इस मुद्दे पर सर्वोच्च न्यायालय एवं विभिन्न उच्च न्यायालय ने भी अपना मत स्पष्ट किया है एवं न्याय प्रणाली को सभी व्यक्तियों के लिए एक समान करने हेतु समान नागरिक संहिता को लागू करने की बात कही है। इसके अलावा केंद्र में स्थापित वर्तमान सत्तारूढ़ दल के चुनावी घोषणा-पत्र में भी इसे लागू करने की बात मुखरता से शामिल रही है। यानि कि, कुल मिलकर देखा जाये तो न्यायपालिका एवं वर्तमान सरकार का मत इस मुद्दे पर लगभग एक समान ही है। लेकिन इन सबके बावजूद भी इसे लागू करने में बाधायें सामने आ रही है। एक तरफ जहाँ यह समान न्याय की अवधारणा को सुदृढ़ करने का एक जरिया लगता है, तो वहीं दूसरी तरफ यह धार्मिक स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार में कटौती का साधन भी मालूम पड़ता है। यानि कि, इस मुद्दे को यदि गौर से देखा जाये तो इसके मूल में स्टेट लॉ बनाम पर्सनल लॉ, विविधता बनाम एकता, संविधान की भावना बनाम लोगों की धार्मिक आस्थाएं, नीति निदेशक बनाम मौलिक अधिकार, महिला सशक्तिकरण बनाम पुरुष वर्चस्व आदि जैसे कई मुद्दे सम्मिलित है। इसीलिए, इस मुद्दे पर एक तर्कसंगत विचार-विमर्श की आवश्यकता है कि, कैसे इस राष्ट्रीय मुद्दे के सामने विधमान चुनौतियों का सामना किया जाये और इसे लागू करने के क्या-क्या प्रावधान हो सकते है। प्रस्तुत आलेख में समान नागरिक संहिता का आशय, इसकी संवैधानिक स्थिति, इस मुद्दे से सम्बन्धित वाद-विवाद तथा साथ ही इसे लागू करने के मार्ग में आने वाली बाधाओं पर प्रकाश डाला गया है। आलेख के अंत में उन उपायों की चर्चा भी की गई है जो इसके समाधान हेतु आवश्यक है। |
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| Keywords | ||
| भारतीय संविधान, समान नागरिक संहिता, विविधता, न्यायालय, हिन्दू कोड बिल | ||
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