पंचायतीराज के सशक्तीकरण में ग्राम सभाओं की भूमिका

Vol-4 | Issue-7 | July 2019 | Published Online: 15 July 2019    PDF ( 158 KB )
Author(s)
Dr. Mahendra Singh Khichar 1

1Principal, Vivekanand P.G. College, Sikar, Rajasthan (India)

Abstract

लोकनायक जय प्रकाश नारायण भी यह मानते थे कि ग्राम सभा भारतीय प्रजातन्त्र का आधार है। उनका मानना था कि वयस्क मताधिकार देने मात्र से ही प्रजातांत्रिक व्यवस्था स्थापित नहीं हो जाती है। उनकी राय में भारतीय प्रजातांत्रिक व्यवस्था की संरचना और स्वरूप को ऊपर की अपेक्षा नीचे की ओर सशक्त आधार प्रदान करने की आवश्यकता है। वे यह मानते थे कि संसद की बजाय ग्रामीण स्तर की संस्थाओं को अधिक शक्तियां दी जानी चाहिए ताकि लोकतन्त्र की जड़ें मजबूत होकर पुष्पित और पल्लवित हो सकें। यद्यपि बलवंत राय मेहता समिति ने पंचायती राज के ढांचे में ग्रामसभा को कोई स्थान नहीं दिया था, फिर भी पंचायती राज अपनाने वाले राज्यों ने ग्राम सभा की रचना का महत्व स्वीकार किया और इसे पंचायती राज व्यवस्था के आधार के रूप में विकसित किया है। यह माना गया है कि ग्राम स्तर पर पंचायत, ग्रामसभा से ही अपने अधिकार ग्रहण करे और ग्रामसभा के प्रति निरन्तर उत्तरदायी रहे, क्योंकि ग्रामसभा में गांव के सभी वयस्क नागरिक सम्मिलित होते हैं।

Keywords
प्रजातांत्रिक व्यवस्था, पुष्पित, पल्लवित, उत्तरदायी, अवधारणा, विकेन्द्रीकरण, त्रिस्तरीय
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