दक्षिण एशिया क्षेत्रीय सहयोग संगठन के संदर्भ में भारतीय विदेश नीति का बदलता स्वरूप

Vol-5 | Issue-2 | February-2020 | Published Online: 16 February 2020    PDF ( 118 KB )
Author(s)
Dr. Laxmi Narayan 1

1Assistant Professor (Political Science), Govt. College, Malsisar, Jhunjhunu, Rajathan

Abstract

दक्षिण एशिया में भारत को एक प्रधान शक्ति के रूप में देखा जाता है, जिसमें आधिपत्य अथवा नेतृत्व की भावना निहित है। अमेरिकी विद्वानों की दृष्टि में “प्राधान्य“ अथवा “आधिपत्य“ को इस रूप में परिभाषित किया गया है- किसी देश अथवा देशों के समूह का ऐसा नेतृत्व जो विशेष भूमिका अदा करता है, विशेष सुविधाओं को प्राप्त करता है, तथा राजनीतिक अथवा आर्थिक क्षेत्र की पद्धतियों की सफलता के लिए विशेष उत्तरदायित्व का निर्वाह करता है। कुछ विचारकों के अनुसार-“प्रधान शक्ति अपनी स्वीकृत नीतियों में परिवर्तन कर सकती है। इन दों परिभाषाओं का विश्लेषण करके देखा जाये तो भारत कठिनाई से ही इस परिभाषा में आ सकता है, क्योंकि भारत दक्षिण एशिया में न तो विशेष भूमिका ही निभाता है, न विशेष सुविधाओं का ही लाभ उठाता है और न कोई क्षेत्रीय राजनीति अथवा आर्थिक पद्धति के संचालन में कोई विशेष उत्तरदायित्व ही निभाता है। फिर भी यदि “सार्क“ देशों का तुलनात्मक अध्ययन किया जाये तो आकार, जनसंख्या, तकनीकी विकास, आर्थिक विकास तथा अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों में निश्चय ही भारत बड़ी भूमिका निभाने वाला बड़ा देश माना जाता है।

Keywords
दक्षिण एशिया, अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्ध, सार्क, पारगमन सन्धि।
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