जैन दर्शन में मोक्ष का स्वरूप
| Vol-4 | Issue-03 | March 2019 | Published Online: 15 March 2019 PDF ( 112 KB ) | ||
| Author(s) | ||
| डॉ० बीरेंद्र मणि त्रिपाठी 1 | ||
|
1एसोसिएट प्रोफेसर प्राचीन इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग, नेहरू ग्राम भारती मानित वि ०वि० इलाहाबाद। |
||
| Abstract | ||
कर्मजन्य, षीर्शस्थानापन्न, सिद्धलोक, परमषान्त अवस्था, मोक्षस्थान, निरतिषय, षिवरूप, क्षेमकर, क्षमोपषम, जन्म-जरा-मरण। जैन-तत्व-मीमांसा के अनुसार संवर के द्वारा कर्मों के आगमन का निरोध हो जाने पर और निर्जरा के द्वारा समस्त पुरातन कर्मों का क्षय हो जाने पर आत्मा की जो निश्कर्म षुुद्धावस्था होती है, वही मोक्ष है। मोक्ष आत्मा की षुद्ध स्वरूपावस्था है। मोक्ष को जीवन का अन्तिम लक्ष्य मानने के कारण जैन-आचार्यों के मोक्ष तथा मोक्ष-मार्ग दोनों पर विस्तार से विचार किया है। |
||
| Keywords | ||
| कर्मजन्य, षीर्शस्थानापन्न, सिद्धलोक, परमषान्त अवस्था, मोक्षस्थान, निरतिषय, षिवरूप, क्षेमकर, क्षमोपषम, जन्म-जरा-मरण। | ||
|
Statistics
Article View: 270
|
||

