जयशंकर प्रसाद के नाटक ’ध्रुवस्वामिनी’ में स्त्री-सशक्तिकरण की भावना
| Vol-4 | Issue-03 | March 2019 | Published Online: 13 March 2019 PDF ( 102 KB ) | ||
| Author(s) | ||
| मीनाक्षी 1 | ||
| Abstract | ||
किसी भी रचनाकार के लिए उसकी कृति अपनी संतान की भाँति होती है। जिस प्रकार पिता अपनी संतान का नामकरण बहुत सोच-समझकर पण्डितों से पूछकर करता है, उसी प्रकार रचनाकार भी अपनी रचना का नामकरण अत्यधिक चिंतन के बाद ही करता है। वह अपनी रचना का नामकरण कुछ ऐसा करना चाहता है, जिससे की पाठक को उसके नाममात्र से रचना की आतंरिक पृष्ठभूमि का बहुत अधिक ज्ञान नही, तो अनुभव अवश्य हो जाए। प्रसाद जी ने नाटक का नाम ’धु्रुवस्वामिनी’ के नाम पर करके नारी सशक्तिकरण की ओर सराहनीय काम किया है। युग-युग से नारी पुरूष द्वारा प्रताड़ित, उपेक्षित और अपमानित होती आ रही है, पर अब अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होने लगी है। प्रस्तुत शोध आलेख में यही बताने का प्रयास किया गया है कि नारी तब तक उपहार की वस्तु ही बनी रहेगी, जब तक वह स्वयं इसका विरोध नहीं करेगी। |
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| Keywords | ||
| प्रसाद, ध्रुवस्वामिनी, नारी-सशक्तिकरण | ||
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