जनजातिय लोक साहित्य का स्वरुपः देओरी लोककथाओं के विशेष सन्दर्भ में
| Vol-4 | Issue-04 | April 2019 | Published Online: 15 April 2019 PDF ( 345 KB ) | ||
| Author(s) | ||
डॉ. लखिमा देओरी
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1अरुणाचल यूनिवर्सिटी ऑफ स्टडीज़, नाम्साई अरुणाचल प्रदेश |
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| Abstract | ||
भाषिक विविधता, भारतीय संस्कृति की पहचान है। इसका सबसे अच्छा उदाहरण भारत के उत्तर-पूर्व प्रदेश में देखा जा सकता है। यहाँ विविध जाति के लोग रहते हैं। भारत के पूर्वोत्तर में आठ राज्य हैं- अरुणाचल प्रदेश, असम, मणिपुर, मेघालय, मिज़ोरम, नागालैंड, सिक्किम और त्रिपुरा। इस क्षेत्र में मुख्यतः विभिन्न आदिवासी समुदाय रहते हैं, जिसके कारण यहाँ बहुभाषिकता देखने को मिलती है। हर जातीय समूह अपनी सांस्कृतिक और भाषाई अतीत से अपनी अलग पहचान रखते हैं। भारत में मुख्यतः चार भाषा परिवार है, जिसके अंतर्गत भारत की अनगिनत भाषाएँ आती हैं। पूर्वोत्तर भारत में मुख्यतः तिब्बती-बर्मन भाषा परिवार की भाषाएँ बोली जाती है। इस लेख में पूर्वोत्तर के देओरी समुदाय के लोक साहित्य का स्वरुप प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है। साथ ही लोक साहित्य का स्वरुप भी। भारत के पूर्वी छोर पर स्थित असम राज्य में मंगोल नस्ल की कई जनजातियाँ हैं, जिनमें से देओरी एक प्रमुख जनजाति है। इन्होंने अपनी भाषा, धर्म, आस्था, लोक-कथा, लोक- गीत आदि जातीय विशेषताओं को संभाले रखा है। |
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| Keywords | ||
| लोक साहित्य, भारत की पूर्वोत्तर जनजातियाँ, देओरी जनजाति, देओरी जनजाति का लोक साहित्य, आस्था, संस्कृति, लोक मान्यताएँ। | ||
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